शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

एक संदेश
हिन्दी बचाओ अभियान में आपका स्वागत है
हिन्दी आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है ,
आओ हिन्दी को बचाए ,देश की भाषा ही देश का गोरव है , "मनोरंजन कलश" (मासिक पत्रिका ) इसी लो को आगे ले जा रही है ,जनवरी में "रास्ट्रभाषा विशेषांक " देश को समर्पित करके इस अभियान में सहयोग करे पत्रिका का अंक बुक कराये ,या वार्षिक सदस्य बने इसी विषय पर लेख , कविता , कहानी , समालोचना प्रेषित करे पोस्ट प्राप्त होने की अन्तिम तारीख दिसम्बर २००९
पता : केशवजांगिड @जीमेल.कॉम ( यहाँ रचना जल्दी प्राप्त होगी )
मनोरंजन कलश @जीमेल.कॉम (या भी दे सकते है )
कॉल कर पत्रिका में स्थान सुरिक्षित कराये ,रचना उत्तम होने पर ही चयनित होगी ( संपादक )
शब्द सीमा : ५०० शब्द
डाक से पोस्ट करे : संपादक ,मनोरंजन कलश , जे - , पांडव नगर ,गली नम्बर - , नई दिल्ली - ९२





लघुकथा - योजना

"
आज हजारो लोगो की मृत्यु नशे से हो रही है ,
लोग शराब पीकर बीमारियो से लड़ रहे है ,
अपनी जिन्दगी तबाह कर रहे है ,
हमें इस बुराई को समाज से ख़त्म करना है हमारी सरकार इसके लिए योजनाये बना रही है " चुनावी सभा में स्थानीय नेता रामजीभाईजी के इतना बोलते ही तालियों की गडगडाहट से माहोल चुनावी हो गया जब नेताजी अपने लाव - लश्कर के साथ रवानगी लेने को थे ,तो एक टीवी पत्रकार ने उनसे पूछ लिया ,
"
रामजी शराब से होने वाली मोतो को रोकने के लिए आपकी सरकार क्या योजना बना rahi रही है , जरा बताइए "
"
योजना बड़ी ही कारगर और गुप्त है , अभी बता दूंगा तो विपक्ष हंगामा मचा देगा " सायरन की आवाज करती उनकी गाड़ी धूल उड़ाती हुई चली गई
अगले दिन नगर के प्रमुख दनिक में ख़बर छपी
"
सरकार ने सो शराब की दुकानों को लाईसेंस दिया ,शराब पर टैक्स में वृदि् टैक्स के मुनाफे से सरकार नशामुक्ति केन्द्र खोलेगी - रामजी भाई "
मंत्रीजी का बयान देख कर वह पत्रकार भी आवक था

-
केशव जांगिड (लेखक)





लघुकथा - नारी

"
अनुज वह एक लड़की है "
"
ठीक है तुम बच्चा गिरवा दो , मै आता हू "
"
वह अस्पताल पहुचता है , तब तक अनुराधा गर्भपात करवा चुकी थी
"
इस दहेजी और महंगाई के ज़माने मै लड़की का बोझ मेरा बेटा नही उठाएगा , समझी तू " रह रह कर उसे सास की बाते याद रही थी यह चौथी बार था , जब सास की कर्णभेदी

बाते और पति की मारपीट से तंग आकर उसने अस्पताल का रास्ता देखा था दो - तीन घंटो बाद अनुराधा पति के साथ घर गई पुरे रास्ते उसे अनुज की जलील करने बाते सुननी पड़ी वह तो रो - रो कर निढाल सी हो गई थी समय पंख लगा कर चला एक दिन घर में कोहराम मच गया,

जब मेज पर पड़ी अनुराधा की गर्भपात रिपोर्ट सास ने देखी वह अनुज के कमरे की तरफ़ दौडी
"
हाय राम , इस कुलक्षणी ने हमें बर्बाद कर दिया , कोख मै पल रहे लड़के को गिरवा आई " सास ने अनुज को रिपोर्ट दिखाई क्रोध से लाल हुए अनुज का हाथ अनुराधा पर चल पाता , तब तक वह उसका हाथ पकड़ चुकी थी
"
मै नही चाहती थी की मेरी कोख से एक खुनी का पुत्र जन्मे , जिसके दिल में अपने पिता की तरह ही नारी का सम्मान ना हो , जो उसे पेरो की जूती समझता हो , जो इन्सान मातृशक्ति और सृजनदात्री नारी का सम्मान ना कर सके ,उसका अंश कोख में रखकर कंलकित नही होना चाहती थी "
"
जीवन का आधार केवल पुरूष ही नही है , नारी भी है , जिस दिन आपको यह सत्य समझ में जाए , मुझे वापस बुला लेना " कहते हुए वह रणचंडी की तरह वह चली गई
उसके पदचाप अब भी माँ , बेटे के दिमाग को झंझोड रहे थे

-
केशव जांगिड (लेखक )




कविता - रिश्ते


कुछ देहे से जन्मे ,
कुछ कोख में पड़े अजन्मे ,
कुछ मनके ,
कुछ अनमने,
कितने रिश्ते अब तक मेने बुने ,


कुछ चाहते जो ,
रिश्ते ना बन पाई ,,
कुछ रिश्तो में ,
चाहत ना बस पाई ,
जिन्दगी रिश्तों और चाह्तों
की डोर में,


उलझी जिन्दगी को यू सुलझाया ,
रिश्तों का जिन्दगी से समझोता कराया ,
रिश्तों से समझोता करते ,
खूब देखे मेने ,
लेकिन समझोतो से रिश्ते ,
बुने मेने बुने
-
केशव जांगिड (लेखक और कवि )




हिन्दी बचाओ अभियान


हिंदी हूँ मैं! हिंदी हूँ मैं..
भारत माता के माथे की बिंदी हूँ
मैदेवों का दिया ज्ञान हूँ मै, घट रही वो शान हूँ मै,
हिन्दुस्तानियों का इमान हूँ मै॥
इस देश की भाषा थी मै,करोडो लोगो की आशा थी मैहिंदी हूँ मैं!
हूँ मैं.. भारत माता के माथे की बिंदी हूँ मैसोचती हूँ शायद बची हूँ मै,
किसी दिल में अभी भी बसी हूँ मै,पर अंग्रेजी के बीच फसी हूँ मै...
न मनाओ तुम मेरी बरसी,मत करों ये शोक सभाएं,
मत याद करो वो कहानी...
नही किसी की जुबानीसोचती थी हिंद देश की भाषा हूँ मै,
अभिव्यक्ति की परिभाषा हूँ मैं,सच्ची अभिलाषा हूँ मैं,
लेकिन अब निराशा हूँ मैं...जी हाँ हिंदी हूँ
मैंभारत माँ के माथे की बिंदी हूँ मैं...
(हिमांशु डबराल की पंक्तिया )

अनुवादक, लेखिका मंजरी जोशी से एक मुलाकात - केशव जांगिड

जब में छोटी थी ,तो बालसुलभ आचरण ,नटखटपन के साथ साथ अनुशासन में भी पक्की थीकई बार अध्यापको की डांट-डपट भी सुननी पड़ती थी ,लेकिन साहित्यकार पिता (रघुवीर सहाय )के संस्कारों और जीवनमूल्यों से परिपूरित मार्गदर्शन ने ही मुझे वर्तमान की सशक्त मंजरी बनाया सरदार पटेल विद्यालय में पढ़ते हुए ,बचपन में एक शरारती पुल्लिंदे से तमीजदार बालिकाबनाने का श्रये पिताजी के प्यार , स्नेह और सहज पालन -पोषण को जाता है अपने रेडियो और
टेलीवजन के समय जब याद करती हू ,तो यथार्थ का भी बोध होता है , उस रटटूतोते और बुद्दू बक्से के नकारात्मक प्रभाव से बचकर मै भाषा ,अनुवाद ,और साहित्य में दक्ष हो सकी तो केवल पिताजी के दुवारा दी गई ज्ञान और उत्साह की नीव से

शादी के बाद भाषाविज्ञानी पति ( डाक्टर हेमंत जोशी ) भी उतना ही मार्गदर्शन मिला समय वह भी था जब मुझे दूरदर्शन में समाचार वक्ता के करियर और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियो में बेहतर तालमेल की जरुरत थी ,तब बेटा पीयूष हुआ ,तब सुबह तीन -चार बजे डयूटी पर जाते हुए भी उसके लिए दूध की बोतल पति के सिहिराने रखना नही भूलती थी ,की कही मेरे बिना बच्चा भूख से ना बिलबिलाने लगे शायद यही शिशु के प्रति माँ का दायित्व या मातॄत्व होता है , जो बेइंतहा दूरी के पश्चात भी दोनों में आत्मिक और मार्मिक अंतसम्बन्ध स्थापित किए रहता है मेरे दुवारा किए गए निर्णयों ने मेरे
गृहस्थ जीवन को एक स्त्री के रूप में सकुशल और विकसित किया ,यह मेरे लिए त्याग नही ,आत्ममूल्यांकन था , जब मेने कैरियर के साथ साथ परिवार को भी उतनी ही तवजो दी पति हेमंत मेरी इसी बात से प्रभावित रहते थे , की मै सम्पूर्ण स्त्री दायित्वों का भलीभांति निर्वहन करती हू
मैने हमेशा
यथार्थवादी रहना सीखा लकिन इसका अभिप्राय यह नही है कि मै कल्पनाशील नही रही इसी कल्पना जो मुझे यथार्थ से काट दे ,उसे मै अपने जीवन मे कोई स्थान नही देती दूसरी बात नेतिकता ही मेरे लिए सबकुछ थी ,इसी मे मै पली बड़ी हुई इसे खोना मेरे लिए प्राण खोने के समान है मैने जीवन स्वाभिमान ,कर्तव्यपरायणता और जिम्मेदारी से जीना सीखा , ये मेरी दृढ इच्छाशक्ति ही थी ,कि मै अपने पिता के साहित्यिक पद चिह्नो का अनुसरण कर पाई ,जो उन्ही कि बदोलत हो सका रसायन शास्त्र के बाद मेरे अपनी उच्च शिक्षा रुसी भाषा मे की इससे उस देश की संस्कृति ,भाषा ,रुसी लोगो की सरलता ,सादगी ,काम के प्रति लगन आदि ने मुझे खूब प्रभावित किया ,जो हमारे भारत की संस्कृति से भी मेल खता है , लेकिन ऐसे जीवनमूल्य अब धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहे है , हमे इनको अपने मन मे बकाहने की जरुरत है
लोगो को कहते सुना है कि आज का बदलाव समय कि मांग है सत्य यह है कि समय कि कोई जरुरत नही होती , वह तो अपने आप मे सम्पूर्ण होता है लोग इसे अपनी जरुरत के अनुसार ढाल लेते है और यही उनकी समस्या का कारन बन जाता है इसी के चलते आज का शहरी युवा बुरी आदतों का शिकार हो रहा है हमें अपनी ज़डो को नही भूलना चाहिए ,इनके बिना हमारा कोई अस्तित्व नही बचेगा दुःख होता है
ऐसे ही आज देश मे हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओ को भुलाया जा रहा है हमें
यथार्थ का बीजारोपण करयुवाओ को हिन्दी पत्रिकारिता और भारतीय भाषाओ के साहित्य से जोड़ना चाहिए हिन्दी मे तो वह शक्ति है ,जोहमारे देश के व्यक्तित्व विकास मे सहायक है
(जैसा केशव जांगिड को बताया )
























एक संदेश

हिन्दी बचाओ अभियान में आपका स्वागत है ।
हिन्दी आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है ,
आओ हिन्दी को बचाए ,देश की भाषा ही देश का गोरव है , "मनोरंजन कलश" (मासिक पत्रिका ) इसी लो को आगे ले जा रही है ,जनवरी में "रास्ट्रभाषा विशेषांक " देश को समर्पित करके । इस अभियान में सहयोग करे । पत्रिका का अंक बुक कराये ,या वार्षिक सदस्य बने । इसी विषय पर लेख , कविता , कहानी , समालोचना प्रेषित करे । पोस्ट प्राप्त होने की अन्तिम तारीख ५ दिसम्बर २००९ ।
पता : केशवजांगिड @जीमेल.कॉम ( यहाँ रचना जल्दी प्राप्त होगी )
मनोरंजन कलश @जीमेल.कॉम (या भी दे सकते है )
कॉल कर पत्रिका में स्थान सुरिक्षित कराये ,रचना उत्तम होने पर ही चयनित होगी ।( संपादक )
शब्द सीमा : ५०० शब्द
डाक से पोस्ट करे : संपादक ,मनोरंजन कलश , जे -५ , पांडव नगर ,गली नम्बर - ८ , नई दिल्ली - ९२

गुरुवार, 26 नवंबर 2009

लघुकथा - योजना


" आज हजारो लोगो की मृत्यु नशे से हो रही है ,
लोग शराब पीकर बीमारियो से लड़ रहे है ,
अपनी जिन्दगी तबाह कर रहे है ,
हमें इस बुराई को समाज से ख़त्म करना है । हमारी सरकार इसके लिए योजनाये बना रही है । " चुनावी सभा में स्थानीय नेता रामजीभाईजी के इतना बोलते ही तालियों की गडगडाहट से माहोल चुनावी हो गया । जब नेताजी अपने लाव - लश्कर के साथ रवानगी लेने को थे ,तो एक टीवी पत्रकार ने उनसे पूछ लिया ,
" रामजी शराब से होने वाली मोतो को रोकने के लिए आपकी सरकार क्या योजना बना rahi रही है , जरा बताइए । "
"योजना बड़ी ही कारगर और गुप्त है , अभी बता दूंगा तो विपक्ष हंगामा मचा देगा । " सायरन की आवाज करती उनकी गाड़ी धूल उड़ाती हुई चली गई ।
अगले दिन नगर के प्रमुख दनिक में ख़बर छपी ।
" सरकार ने सो शराब की दुकानों को लाईसेंस दिया ,शराब पर टैक्स में वृदि् । टैक्स के मुनाफे से सरकार नशामुक्ति केन्द्र खोलेगी - रामजी भाई "
मंत्रीजी का बयान देख कर वह पत्रकार भी आवक था ।

-केशव जांगिड (लेखक)

लघुकथा - नारी


" अनुज वह एक लड़की है । "
" ठीक है तुम बच्चा गिरवा दो , मै आता हू ।"
"वह अस्पताल पहुचता है , तब तक अनुराधा गर्भपात करवा चुकी थी ।
" इस दहेजी और महंगाई के ज़माने मै लड़की का बोझ मेरा बेटा नही उठाएगा , समझी तू । " रह रह कर उसे सास की बाते याद आ रही थी । यह चौथी बार था , जब सास की कर्णभेदी

बाते और पति की मारपीट से तंग आकर उसने अस्पताल का रास्ता देखा था । दो - तीन घंटो बाद अनुराधा पति के साथ घर आ गई । पुरे रास्ते उसे अनुज की जलील करने बाते सुननी पड़ी । वह तो रो - रो कर निढाल सी हो गई थी । समय पंख लगा कर चला । एक दिन घर में कोहराम मच गया,

जब मेज पर पड़ी अनुराधा की गर्भपात रिपोर्ट सास ने देखी । वह अनुज के कमरे की तरफ़ दौडी ।
"हाय राम , इस कुलक्षणी ने हमें बर्बाद कर दिया , कोख मै पल रहे लड़के को गिरवा आई ।" सास ने अनुज को रिपोर्ट दिखाई । क्रोध से लाल हुए अनुज का हाथ अनुराधा पर चल पाता , तब तक वह उसका हाथ पकड़ चुकी थी ।
" मै नही चाहती थी की मेरी कोख से एक खुनी का पुत्र जन्मे , जिसके दिल में अपने पिता की तरह ही नारी का सम्मान ना हो , जो उसे पेरो की जूती समझता हो , जो इन्सान मातृशक्ति और सृजनदात्री नारी का सम्मान ना कर सके ,उसका अंश कोख में रखकर कंलकित नही होना चाहती थी । "
" जीवन का आधार केवल पुरूष ही नही है , नारी भी है , जिस दिन आपको यह सत्य समझ में आ जाए , मुझे वापस बुला लेना । " कहते हुए वह रणचंडी की तरह वह चली गई ।
उसके पदचाप अब भी माँ , बेटे के दिमाग को झंझोड रहे थे ।

-
केशव जांगिड (लेखक )

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

कविता - रिश्ते

कुछ देहे से जन्मे ,
कुछ कोख में पड़े अजन्मे ,
कुछ मनके ,
कुछ अनमने,
कितने रिश्ते अब तक मेने बुने ,


कुछ चाहते जो ,
रिश्ते ना बन पाई ,,
कुछ रिश्तो में ,
चाहत ना बस पाई ,
जिन्दगी रिश्तों और चाह्तों
की डोर में,


उलझी जिन्दगी को यू सुलझाया ,
रिश्तों का जिन्दगी से समझोता कराया ,
रिश्तों से समझोता करते ,
खूब देखे मेने ,
लेकिन समझोतो से रिश्ते ,
बुने मेने बुने
- केशव जांगिड (लेखक और कवि )

सोमवार, 23 नवंबर 2009

शनिवार, २१ नवम्बर २००९

अनमोल रिश्ता


पिता संतति का सम्बन्ध है जो ,
पानी - पेड़ में अनुबंध है वो ।

जनक - संतान में सम्बन्ध है जो ,
पालक - आश्रयी का करबंध है वो ।

जीवन उत्पत्ति की करताल है ,
सयमेव झंकृत ताल है ।


आदर और स्नेह का मध्यस्थ है,
अन्य संबंधो से तटस्थ है ।


वो तो है भवजीवन के आरम्भ
का शंखनाद ,
पोषक और पिपासु के
मध्य का अनुनाद ।


संगीत और संगति के
मध्य की लय है ,
आशा और अनुरोध
का विलय है
- केशव जांगिड (कवि और लेखक )
(बालसाहित्य बाल क्लब से पुरुस्कृत - २००८)






माँ की वेदना






डगमगाती बेटी जब गिर जाती है ,
माँ डर जाती है ,
सोचती है ,
कही चोट का निशा ना बन जाए ,
विवाह की संभावनाए ना
घट जाए ।

लड़की किसी से नही लडती
जानती है ,
पराजय पर उसका ही एकाधिकार
है ।

इस पुरूषवादी समाज में हर तरफ
उसकी ही हार है ।
झूलती है वह सुख, दुख
के झूले में ,
बचाती है संस्कार, मूल्य ,अस्मिता
डरती है एक दिन वह खुद
बेटी को जन्म ना दे ,
उसे बचाने के चक्कर में
गिरने से ,
अपनी मर्यादा ना खो दे ।

समझाती है माँ बेटी को
ना समझ खुद को कमजोर,
एक कोशिश पुनः कर पुरजोर
संसार अवश्य चूमेगा तेरे कदम
आगे बढ़ ,
है तुझमे दम।

- केशव जांगिड ( कवि और पत्रकार )
(बाल साहित्य बाल क्लब से सम्मानित -२००८ )

कविता - बेटी





बाबुल की आन और शान है बेटी ,
इस धरा पर मालिक का वरदान
है बेटी ,

जीवन यदि संगीत है तो सरगम
है बेटी ,
रिश्तो के कानन में भटके इन्सान
की मधुबन सी मुस्कान है बेटी,


जनक की फूलवारी में कभी प्रीत
की क्यारी में ,
रंग और सुगंध का महका गुलबाग
है बेटी ,

त्याग और स्नेह की सूरत है ,
दया और रिश्तो की मूरत है
बेटी ,


कण - कण है कोमल सुंदर
अनूप है बेटी ,
ह्रदय की लकीरो का सच्चा
रूप है बेटी ,

अनुनय , विनय , अनुराग
है बेटी ,
इस वसुधा और रीत और प्रीत
का राग है बेटी ,

माता - पिता के मन का
वंदन है बेटी ,
भाई के ललाट का चंदन
है बेटी ।
- केशव जांगिड(कवि और लेखक )
(बाल साहित्य बाल क्लब से सम्मानित -२००८ )

जागरण गीत


लिया तिरंगा हाथो में ,
अपना लहू बहा कर ,
भारत को आजाद कराया
,
अपना शीश कटाकर ।

खुदीराम चढ़ा सूली पर ,
बिस्मिल ने फांसी पाई ,
भगत सिंह ने क़ुरबानी दी ,
लाला ने लाठी खायी ।

गाँधी जी ने किया आहवान ,
विदेशी होली जलाई,
पंचशील अपना कर नेहरू ने ,
भारत को नई रहा दिखाई।


था वो सागरमल गोपा ,
अग्नि पथ शहीदी पाई ,
थी रानी मर्दानी वो ,
जिससे गोरो ने मुंहकी खाई ।

मंगल ने विद्ध्रोह फूंका,
सावरकर ने चेतना जगाई ,
इन्ही सत्याग्रहों से हमने ,
मातृभूमि आजाद कराई ।

हुए साठ उन को ,
गाथाये जो वीरो ने बनाई ,
सोचो जरा अपने मन में ,
क्या सच्ची आजादी हमने पाई ।

कभी आतंकी सांसद पर ,
कभी स्वाभिमान पर वार करे ,
जयपुर , दिल्ली , बंगलुरु में
जनता हाहाकार करे ।

कश्मीरी माता बहनों से ,
आतंकी खिलवाड़ करे ,
ऐसा नृशंस तांडव देख ,
भारत माँ चीत्कार करे ।

कभी हमारी सीमाओं पर ,
शत्रु दो से चार बने ,
ऐसे में हम जगतगुरु ,
क्यो ना प्रतिकार करे ।

उत्तर ,दक्षिण , पूरब ,पश्चिम ,
बारूदों से दहले है ,
भारत माँ के वीर सपूतो ,
अब हम नहले पर दहले है ।

भारत माँ की रक्षा में ,
अर्पित करे शोर्य , तरुणाई ,
दुष्टो का करे दमन हम ,
ले विजय की अंगडाई ।

लोहपुरूष से बने हम ,
गाँधी से बने आहिंसावादी,
काम , क्रोध , वासनाए त्यागे ,
पहने हम स्वदेशी खादी ।

सदा -सर्वदा करे अंत,
भ्रष्टाचारी दानव का हम ,
शान्ति के अणु परमाणु बन ,
दीन - दुखियों के बने मरहम

बुराईया अब भारत छोड़ो ,
आओ युवाओ भारत जोड़ो ,
सत्य , संकल्प , सेवा ,सहयोग ,
तत्वों से भारत को जोड़ो ।

देशप्रेम की खातिर प्यारो ,
दुश्मन से तुम लड़ जाओ ,
मातृभूमि की रक्षा में ,
मस्तक अमर कर जाओ ।

तभी हमारी यह वसुधा ,
कर्मभूमि बलवान बनेगी ,
भारत भाग्य विधाता होगा ,
दुनिया हमें नमन करगी ।

केशव जांगिड (कवि और पत्रकार )
(बाल साहित्य बाल क्लब से पुरुस्कृत -2008)