जब में छोटी थी ,तो बालसुलभ आचरण ,नटखटपन के साथ साथ अनुशासन में भी पक्की थी । कई बार अध्यापको की डांट-डपट भी सुननी पड़ती थी ,लेकिन साहित्यकार पिता (रघुवीर सहाय )के संस्कारों और जीवनमूल्यों से परिपूरित मार्गदर्शन ने ही मुझे वर्तमान की सशक्त मंजरी बनाया। सरदार पटेल विद्यालय में पढ़ते हुए ,बचपन में एक शरारती पुल्लिंदे से तमीजदार बालिकाबनाने का श्रये पिताजी के प्यार , स्नेह और सहज पालन -पोषण को जाता है । अपने रेडियो औरटेलीवजन के समय जब याद करती हू ,तो यथार्थ का भी बोध होता है , उस रटटूतोते और बुद्दू बक्से के नकारात्मक प्रभाव से बचकर मै भाषा ,अनुवाद ,और साहित्य में दक्ष हो सकी तो केवल पिताजी के दुवारा दी गई ज्ञान और उत्साह की नीव से ।
शादी के बाद भाषाविज्ञानी पति ( डाक्टर हेमंत जोशी ) भी उतना ही मार्गदर्शन मिला । समय वह भी था जब मुझे दूरदर्शन में समाचार वक्ता के करियर और गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियो में बेहतर तालमेल की जरुरत थी ,तब बेटा पीयूष हुआ ,तब सुबह तीन -चार बजे डयूटी पर जाते हुए भी उसके लिए दूध की बोतल पति के सिहिराने रखना नही भूलती थी ,की कही मेरे बिना बच्चा भूख से ना बिलबिलाने लगे । शायद यही शिशु के प्रति माँ का दायित्व या मातॄत्व होता है , जो बेइंतहा दूरी के पश्चात भी दोनों में आत्मिक और मार्मिक अंतसम्बन्ध स्थापित किए रहता है । मेरे दुवारा किए गए निर्णयों ने मेरे गृहस्थ जीवन को एक स्त्री के रूप में सकुशल और विकसित किया ,यह मेरे लिए त्याग नही ,आत्ममूल्यांकन था , जब मेने कैरियर के साथ साथ परिवार को भी उतनी ही तवजो दी । पति हेमंत मेरी इसी बात से प्रभावित रहते थे , की मै सम्पूर्ण स्त्री दायित्वों का भलीभांति निर्वहन करती हू ।
मैने हमेशा यथार्थवादी रहना सीखा । लकिन इसका अभिप्राय यह नही है कि मै कल्पनाशील नही रही । इसी कल्पना जो मुझे यथार्थ से काट दे ,उसे मै अपने जीवन मे कोई स्थान नही देती । दूसरी बात नेतिकता ही मेरे लिए सबकुछ थी ,इसी मे मै पली बड़ी हुई । इसे खोना मेरे लिए प्राण खोने के समान है । मैने जीवन स्वाभिमान ,कर्तव्यपरायणता और जिम्मेदारी से जीना सीखा , ये मेरी दृढ इच्छाशक्ति ही थी ,कि मै अपने पिता के साहित्यिक पद चिह्नो का अनुसरण कर पाई ,जो उन्ही कि बदोलत हो सका । रसायन शास्त्र के बाद मेरे अपनी उच्च शिक्षा रुसी भाषा मे की । इससे उस देश की संस्कृति ,भाषा ,रुसी लोगो की सरलता ,सादगी ,काम के प्रति लगन आदि ने मुझे खूब प्रभावित किया ,जो हमारे भारत की संस्कृति से भी मेल खता है , लेकिन ऐसे जीवनमूल्य अब धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहे है , हमे इनको अपने मन मे बकाहने की जरुरत है ।
लोगो को कहते सुना है कि आज का बदलाव समय कि मांग है । सत्य यह है कि समय कि कोई जरुरत नही होती , वह तो अपने आप मे सम्पूर्ण होता है । लोग इसे अपनी जरुरत के अनुसार ढाल लेते है और यही उनकी समस्या का कारन बन जाता है । इसी के चलते आज का शहरी युवा बुरी आदतों का शिकार हो रहा है । हमें अपनी ज़डो को नही भूलना चाहिए ,इनके बिना हमारा कोई अस्तित्व नही बचेगा । दुःख होता है ।
ऐसे ही आज देश मे हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओ को भुलाया जा रहा है । हमें यथार्थ का बीजारोपण करयुवाओ को हिन्दी पत्रिकारिता और भारतीय भाषाओ के साहित्य से जोड़ना चाहिए । हिन्दी मे तो वह शक्ति है ,जोहमारे देश के व्यक्तित्व विकास मे सहायक है ।
(जैसा केशव जांगिड को बताया )

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