मकरंदित पुष्पों के झूलो में ,
भ्रमर से तितली के अनुबंधों में ,
प्रीत - स्नेह के नवबंधो में ,
आ रहा है मेरा बसंत।
दहकते पलाश की बोछार में ,
धरा से गगन के कटबंधो में ,
सोंधी अमलताश की सुगंधों में ,
गुनगुना रहा है मेरा बसंत ।
पीत - मुदित सरसों के पुष्पों में ,
गुलमोहर की मधुकर डालो में ,
गुलमोहर की मधुकर डालो में ,
उन्मुक्त , उन्मादक विलासों में ,
नवगीतों ,बधाई भरे उल्लासो में ,
महक रहा है मेरा बसंत ।



