सोमवार, 14 दिसंबर 2009

कविता - मेरा बसंत



मुस्कुराती कलियों के मेलो में ,

मकरंदित पुष्पों के झूलो में ,

्रमर से तितली के अनुबंधों में ,


्रीत - स्नेह के नवबंधो में ,

रहा है मेरा बसंत।



फाल्गुनी हवा की बयार में ,

हकते पलाश की बोछार में ,

धरा से गगन के कटबंधो में ,

सोंधी अमलताश की सुगंधों में ,

गुनगुना रहा है मेरा बसंत










पीत - मुदित सरसों के पुष्पों में ,
गुलमोहर की मधुकर डालो में ,

उन्मुक्त , उन्मादक विलासों में ,



नवगीतों ,बधाई भरे उल्लासो में ,



महक रहा है मेरा बसंत











































































































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