गुरुवार, 26 नवंबर 2009

लघुकथा - नारी


" अनुज वह एक लड़की है । "
" ठीक है तुम बच्चा गिरवा दो , मै आता हू ।"
"वह अस्पताल पहुचता है , तब तक अनुराधा गर्भपात करवा चुकी थी ।
" इस दहेजी और महंगाई के ज़माने मै लड़की का बोझ मेरा बेटा नही उठाएगा , समझी तू । " रह रह कर उसे सास की बाते याद आ रही थी । यह चौथी बार था , जब सास की कर्णभेदी

बाते और पति की मारपीट से तंग आकर उसने अस्पताल का रास्ता देखा था । दो - तीन घंटो बाद अनुराधा पति के साथ घर आ गई । पुरे रास्ते उसे अनुज की जलील करने बाते सुननी पड़ी । वह तो रो - रो कर निढाल सी हो गई थी । समय पंख लगा कर चला । एक दिन घर में कोहराम मच गया,

जब मेज पर पड़ी अनुराधा की गर्भपात रिपोर्ट सास ने देखी । वह अनुज के कमरे की तरफ़ दौडी ।
"हाय राम , इस कुलक्षणी ने हमें बर्बाद कर दिया , कोख मै पल रहे लड़के को गिरवा आई ।" सास ने अनुज को रिपोर्ट दिखाई । क्रोध से लाल हुए अनुज का हाथ अनुराधा पर चल पाता , तब तक वह उसका हाथ पकड़ चुकी थी ।
" मै नही चाहती थी की मेरी कोख से एक खुनी का पुत्र जन्मे , जिसके दिल में अपने पिता की तरह ही नारी का सम्मान ना हो , जो उसे पेरो की जूती समझता हो , जो इन्सान मातृशक्ति और सृजनदात्री नारी का सम्मान ना कर सके ,उसका अंश कोख में रखकर कंलकित नही होना चाहती थी । "
" जीवन का आधार केवल पुरूष ही नही है , नारी भी है , जिस दिन आपको यह सत्य समझ में आ जाए , मुझे वापस बुला लेना । " कहते हुए वह रणचंडी की तरह वह चली गई ।
उसके पदचाप अब भी माँ , बेटे के दिमाग को झंझोड रहे थे ।

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केशव जांगिड (लेखक )

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