कुछ देहे से जन्मे ,
कुछ कोख में पड़े अजन्मे ,
कुछ मनके ,
कुछ अनमने,
कितने रिश्ते अब तक मेने बुने ,
कुछ चाहते जो ,
रिश्ते ना बन पाई ,,
कुछ रिश्तो में ,
चाहत ना बस पाई ,
जिन्दगी रिश्तों और चाह्तों
की डोर में,
उलझी जिन्दगी को यू सुलझाया ,
रिश्तों का जिन्दगी से समझोता कराया ,
रिश्तों से समझोता करते ,
खूब देखे मेने ,
लेकिन समझोतो से रिश्ते ,
बुने मेने बुने ।
- केशव जांगिड (लेखक और कवि )
मंगलवार, 24 नवंबर 2009
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