शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

हास्य व्यंग्य -2010


'मच्छरों की दीवानगी' (शन्नो श्रीवास्तव )


मच्छरों की इतनी शरारत सही

है इनमें रत्ती भर भी शराफत नहीं

हैवह हमें सताने की जुर्रत करते रहे

हैं और हम मजबूर होकर सहते रहे हैं

तहजीब न सीखी है इन्होने अब तलककाट लेते

हैं झपकती

है जैसे पलक भगाने की मैं तरकीबें करती रही हूँ

इनकी आहट से बराबर डरती रही हूँ

मुझे हर दिन जख्मों से घायल किया

हैअपनी तदबीरों से मुझको कायल किया हैना खौफ

है उनको उस खुदा काक्या

करूँ मैं इनकी हर अदा का इन जल्लादो ने ढाये

हैं इतने कहर याद आते रहेंगे

वह मुझे हर पहरशर्म का पानी आँखों में मर चुका

हैमुझसे बदला न जाने किस जनम का है

जिक्र जब छिड़ता है

इनकी फितरत कासोचती हूँ

एक अजूबा

हैं इस कुदरत काखून पीकर भी जी भर,

ये रहते

हैं प्यासे किस मिट्टी से यह जल्लाद गये

हैं तराशेगुनगुनाते, भुनभुनाते चुभोते

हैं नश्तरइनके कत्ले-आम का गवाह होता

है बिस्तरइन नादानों को कब

इतना इल्म होगा आखिर

में इनको ही अंजाम होगा भुगतनाकिसी

दिन भी न करते हैं

कोई इनायत बख्श दें

हमें जुल्मों से करें कुछ रियायत दीवानगी

बढ़ जाती है हद से ही ज्यादायह सुबह तक न

कहते हैं अलविदा।


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