शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

हास्य व्यंग्य उत्सव

उत्तर और बिहार में पंगा (शन्नो श्रीवास्तव )

बस जब आई भरी खचाखच कुछ लोग चढ़े कुछ गये
उतर धक्के से एक गिरा टोकराजिसके सारे लड्डू गये
बिखररुके एक सज्जन फिर झट से जब गिरा टोकरा
नीचेतब देखा कोई वहाँ खड़ा था चिपका उनके पीछे
खड़े थे वह धोती चप्पल में कांधे पर संदूक
उठायेतेल से चिपके बालों में गाँठ लगी चुटिया
लहरायेपान भरा था मुँह में उनके और गले में
पड़ा अंगौछापुचुर-पुचुर थूका जमीन परफिर आस्तीन
से मुँह पोंछाबोले हमको भी जल्दी है बाबू बस है
अब चलने ही वालीना ऐसे आँख दिखाओ हमको है
साथ में हमरी घरवाली बाबू जी बोले ' हट दूर
खड़ा होवरना दूँगा ऐसा झापड़ आयेगी नानी याद तुझे
और गिरेगा दूर सड़क परधक्का देकर हैं तूने मेरे सारे
लड्डू गिरा दिये क्या छोड़ है आया आँखें घर पर जो कोई
दिखा नहीं दायें-बायें 'चुटिया वाले बोले ' देखोअब हो जायेगी
मारामारीहम कुश्ती में भी माहिर हैं और नाम है
हमरा वनवारी तुम क्या अपनी तमीज घर पर उतारि
रखि आये हो और सर पर टोपा पहिनजेंटलमैंन बनि आये हो
हैं आप उत्तरी हम हूँ बिहारीआओ हो जायें दो-दो हाथ
अब आपने हमको ललकारा है बढ़ गयी है अब इतनी
बात 'बाबू बोले ' तेरे जैसा मूढ़ बुद्धि का ना कोई अब
तक देखा 'चुटिया वाले बोले ' ठीक है देखोतीर है
जब ऐसा फेंका 'हो गया सीन लड़ाई का तब
वहाँ पर अच्छा ख़ासाजुट गयी भीड़ तमाम और
बन गया एक तमाशातू-तू , मैं-मैं हुई बहुत पर
निकल ना पाया कोई हल तब कंडक्टर ड्राइवर से
बोला'अरे भइया छोड़ इन्हें जल्दी चल'।

(मोलिक लेखन हेतु शुभ कामनाये , केशव जांगिड ,उपसंपादक ,मनोरनजन कलश)

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