
व्यंग्य - दादी टी शॉप (जमाल 'अहद ' ,साऊदीअरब से )
जाड़े कि कपकपाती अँधेरी रात में हॉस्पिटल से नाईट ड्यूटी कर के निकलने को ही था कि जी चाहा एक कप गरमा गरम चाय पी जाए. घर में इस समय चाय तो मिलने से रही . श्रीमती जी ने यह कह कर इनकार कर देना था कि ,” बार बार परेशान ना करो . बच्चों को सुबह स्कूल जाना है . जल्दी सो जाओ . यह मूई हॉस्पिटल की ड्यूटी भी अजीब है , ना दिन को चैन ना रात को आराम . इतनी रात को चाय पीने से नींद भी नहीं आयेगी. वगैरह वगैरह.” इनका कहना भी ठीक ही है . पिताजी डॉक्टर थे लेकिन हमेशा यही सीख देते थे कि बेटा डॉक्टर मत बनना , जिंदगी अजीर हो जाएगी . लेकिन खुद हर समय मरीजों की मदद के लिए तय्यार रहते थे . कभी आधी रात को दरवाज़े की घंटी बजती तो मैं खीझ उठता था की दरवाज़ा नहीं खोलूँगा . यह कोई समय है किसी के घर आने का ? लेकिन पिताजी फ़ौरन दरवाज़ा खोल कर मुस्कुराते हुए पूछते कहिये क्या बात है ? लोगों का तो कहना था की डॉक्टर साहब की बात से ही आधी बीमारी भाग जाती है . अब यह सब बातें अपनी श्रीमतीजी को कैसे समझाऊँ , कैसे बताऊँ की मरीज़ के चेहरे पर मुस्कराहट देख कर कितनी राहत होती है , इसलिए सोंचा की अच्छा है कि चाय बाहर ही पी जाए ताकि इनकी बक बक तो ना सुनने को मिले .हॉस्पिटल के बगल ही में एक “दादी टी शॉप ” थी . एक बूढ़ी औरत इस दुकान को चलाती थी . हम सब उसे दादी कह कर बुलाते थे और वह हमें ” नूनू ” . बंगला में छोटे बच्चों को नूनू कहकर बुलाते हैं . दादी हमें उस समय से जानती है जब 1st इयर में एडमिशन के बाद हमारी रैगिंग चल रही थी दादी की दुकान के सामने . हमारे सीनीयर ने आर्डर किया था ” एक घूँट में पूरी चाय पी जाओ ”. कोशिश की तो जीभ जल गयी , दर्द से बिलबिला उठा. तब दादी ने आकर जान बचाई . सीनियर्स को फटकार लगाई ,” क्या अपने दिन भूल गए जब भीगी बिल्ली की तरह अपने सीनियर्स से छुपते फिरते थे और मैं तुम्हें अपने दुकान में छुपा देती थी . यह नूनू बड़ा भोला है . इस पर इतना जुल्म ना करो .” दादी की दुकान के सामने जा कर मैंने अपने पुराने अंदाज़ में आवाज़ लगाई ” की दादी , घुमाचेन ना की ( दादी क्या सो रही हो )?” भीतर से एक कमज़ोर सी आवाज़ आयी ” नूनू तू कैसा है रे ”. दादी थोड़ी बीमार सी लगी . मन विचलित हो उठा . दुकान के अन्दर झांक कर देखा तो स्तब्ध रह गया . एक फूस की चटाई पर दादी लेटी थी . उसके शरीर पर बस एक नाम मात्र को चादर थी ठण्ड से बचने के लिए . बुरी तरह कपकपा रही थी बेचारी . उसका माथा छु कर देखा तो बहुत तेज़ बुखार था . फिर भी बोली ,” नूनू अदरक वाली चाय पीएगा ?” मेरा दिल भर आया . खुद इतनी तकलीफ में थी लेकिन फिर भी मेरा इतना ख्याल था उसको . मैंने बगल में पड़ी एक जर्जर सी रजाई उसके ऊपर डाली ताकि कुछ तो ठंडक से दादी को राहत मिले . फिर दादी के पोते से जो की दादी की दुकान में ही रहता था अपनी माँ के साथ और दादी का हाथ बटाता था, यह कहकर हॉस्पिटल की तरफ भागा कि तू चाय के लिए पानी गरम कर , मैं अभी आया . वापस आकर अदरक वाली चाय के साथ बुखार कि गोली दादी को खिलाई . थोड़ी देर के बाद उसको दूध और पाव जो कि दादी का मनपसंद खाना था खिलाया . जब दादी की तबीयत थोड़ी संभली तो चहकने लगी . पूरे परिवार का हाल चाल पूछ लिया . कहने लगी ,” सुना है की तुझे दिल का दौरा पड़ा था और ऑपरेशन भी हुवा. अब कैसा है तू ? दवाई वगैरह टाइम पर लेता है की नहीं ? मैं तो शुरू से कहती थी की इतनी सिगरेट मत पीया कर लेकिन तू कहाँ मानने वाला . देख लिया नतीजा ?” दादी की सारी बातें सर झुका कर सुनता रहा . मेरी आँखों से आंसू बह निकले .शायद मेरी अपनी माँ ने इतना अपनापन नहीं दिखाया था मेरे साथ . जबसे मैंने दादी को देखा ऐसे ही देखा , प्यार की मूर्ती . जब भी कॉलेज जाता एक बार उस देवी के दर्शन जरूर करता . परीक्षा के दिनों में वह मुझे अपने हाथ से दही खिलाना कभी नहीं भूली . मैं अपनी हर परेशानी हर तकलीफ दादी को सुनाता था . पता नहीं क्यों सारी बातें बता कर दिल को बड़ा चैन मिलता था . मेडिकल की डिग्री लेने के बाद ट्रेनिंग और उसके बाद फिर स्पेशलिस्ट की पढ़ाई और ट्रेनिंग . भाग्यवश अपने ही कॉलेज के हॉस्पिटल में एक बालरोग विशेषग्य की जगह खाली थी , सो मैंने भी अर्जी दे दी और मेरा चयन हो गया . आज पचीस साल से यहाँ पर कार्यरत हूँ. हर काम के लिए , हर परीक्षा या इंटरवीऊ के लिए दादी का आशीर्वाद लेना नहीं भूला . दादी के पति का देहांत हमारे हॉस्पिटल में ही हुवा था . टी .बी . की बीमारी थी – आखरी हालत में पहुंचा था बेचारा हॉस्पिटल . डाक्टरों की अन्थक प्रयास के बाद भी वह बच नहीं पाया . दादी का एक १० -१२ साल का बेटा था उसके साथ . हॉस्पिटल के लोगों को तरस आया और उन लोगों ने चंदा जुटा कर उसके पति के क्रिया करम का इन्तेजाम किया और हॉस्पिटल के बगल ही में एक झोपडी बनवा दी दादी के रहने के लिए . जीविका चलाने के लिए दादी ने चाय की दुकान शुरू कर दी जो की चल निकली . बेटा बड़ा हुवा तो दादी की मुश्किलें भी बढीं . उसको जूए और शराब की लत लग चुकी थी . बात बात पर अपनी माँ से झगडा करता और पैसे ना मिलने पर धमकियाँ देता . फिर किसी के कहने पर की इसकी शादी कर दो सुधर जायेगा , दादी ने बेटे की शादी कर दी . साल गुजरा नहीं कि पोता भी आ गया . लेकिन बेटे कि आदत में सुधार नहीं हुवा . एक दिन मैं इमरजेंसी रूम में बैठा था कि दादी बेटे को लेकर पहुंची . वोह पेट के दर्द से कराह रहा था . जांच करने पर पता चला कि उसका लीवर पूरी तरह ख़राब हो चुका था शराब कि वजह से . चंद दिनों के बाद बेटा भी चल बसा . अब दादी के लिए दुनिया में सिर्फ बहु और पोते ही बचे थे . लेकिन फिर भी उसने हार नहीं मानी और जिंदगी से लड़ती रही . जब दादी का बुखार उतर गया तो दुसरे दिन आने का वादा कर के मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा . साथ ही साथ यह भी सोंचता जा रहा था दादी के बारे में . यह बंगाल की मैं बिहार का . उसकी भाषा अलग , मेरी भाषा अलग . लेकिन फिर भी कितना अपनापन लगता है जब भी मैं उस देवी को देखता हूँ . उसने अपनी भाषा मुझे सिखाई और मैंने उसे अपनी . उसने बंगाल की मिष्टी हमें खिलाई तो हमने उसे बिहार की जलेबी . आज जब के मैं ५० वर्ष का हो गया हूँ , मेरा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और बेटी मेडिकल में प्रवेश के लिए जीतोड़ परिश्रम कर रही है , दादी आज भी मुझे नूनू कह कर बुलाती है . उसके मुख से नूनू सुनकर मैं गदगद हो उठता हूँ . काश हमारे देश की सारी जनता ऐसी ही होती. काश हमारे पूरे भारतवर्ष में भाषा , धर्म और जाती के नाम पर भेद भाव नहीं किया जाता तो आज हमारी धरती स्वर्ग होती . जननी जन्म भूमिश्च . स्वर्गढ़ापी गरीयसी (बालरोग विशेषग्य, सफवा जेनेरल हॉस्पिटल, सऊदी अरब)
( इस मोलिक रचना के लिए बधाई ....केशव जांगिड , उपसंपादक , मनोरंजन कलश )

Waah !! Bahut Khoob, Jamaal Bhai !!
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