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.॥(1)भारतीय नीति निर्माताओ को धीरे धीरे ही सही किन्तु यह समझ आ गया है की चीन उनकी भलमनसाहत को मज़बूरी समझ रहा है ।एक दो साल पहले तक जहा चीन की आलोचना को कुटनीतिक मर्यादाओ के खिलाफ माना जाता था ।वही भारतीय सरकार द्वारा अब उससे तू तू मे मे से परहेज नहीं किया जा रहा है . भारत द्वारा सामूहिक स्वर मे चीन को यह सन्देश देने की कोशिश की जा रही है की ड्रेगन भारत को कमजोर समझने की हिमाकत ना करे .यह तो जग जाहिर है की चीन और भारत का सीमाविवाद है और चीन समय समय पर भारत की तरक्की पर ब्रेक लगाने की कोशिश करता रहा है .जानकार तो यहाँ तक कहते ही भारत और चीन के बीच के रिश्ते परिपक्व दिखाई देते है लेकिन है नहीं. १९६२ की सी स्थिति पुन बनती नजर आ रही है .चीन भारत के लिए कितना खतरनाक हो सकता है ,भारत को क्या सावधानिया रखनी चाहिए . विश्लेषण कर रहे है स्वतंत्र पत्रकार केशव जांगिड .... (2)याद कीजिये की जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मे रक्षा मंत्री जार्ज फ्रानान्दिस ने चीन को भारत का दुश्मन नंबर एक बताया था तो चारो और हडकंप मच गया था .क्योकि भारत हिंदी चीनी भाई भाई की राह पर चल रहे था . लेकिन आज रिश्ते तेजी से बदले है . अब चीन की साम्राजवादी नीतियों को भापते हुए भारत भी चीन को आखे दिखाने लगा है .इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिला पिछले दिनों जब रक्षा मंत्री एंटनी ने एक सेन्य कार्यक्रम मे यह कहा "की हमारे लिए पकिस्तान और चीन एक जैसे ही शत्रु है ". दरअसल चीन नहीं चाहता की एशिया मे उसके आलावा किसी और की भी हुकूमत हो . वह भारत को हमेशा अपने चिरपरिचित प्रतिदुंदी के रूप मे देखता आया है . भारत की तरक्की पर अंकुश लगाने के लिए उसने अमेरिका से हुए परमाणु प्रसार विधेयक को विश्व बिरादरी के सामने पारित होने से रोका , कश्मीरी लोगो को अलग वीजा दिया , एशियाई विकास बेंक द्वारा भारत को ऋण दिए जाने का विरोध किया यहाँ तक की नेपाल मे चीनी शासन वाली सरकार को चलने के लिए वहा के सांसदों को खरीदने तक की कोशिश की .कही ना कही चीन भी यह जनता है की आर्थिक महाशक्ति बनते भारत से सीधे मुकाबला करना टेडी खीर साबित होगा .अक्साई चीन पर कब्ज़ा ,पाक अधिकृत कश्मीर मे अपनी सेनाये भेजना ,तिब्बत मे भारतीय सीमा के पास रेल लाइन बिछाना इन बातो की तरफ इशारा करता है की चीन एशिया का अमेरिका बनने के सपने देख रहा है .लेकिन उसे यह चिंता भी है की यदि भारत ने उसके चिर प्रतिद्वदियो जैसे जापान ,ताइवान ,इंडोनेशिया ,दलाई लामा ,फिलीपींस ,हान्ग्कोंग से हाथ मिला लिया तो उसके सपने अधूरे रह जायेगे . भारत के अपने इन पड़ोसियों से मधुर सम्बन्ध है .चीन का तो यह भी कहना है की अरुणांचल नया ताइवान है ,जो चीन का ही हिस्सा है लेकिन भारत इस बात को सिरे से खारिज करते आया है . भारत से लगी सीमाओं पर चीन ने १०,००० से भी ज्यादा सेनिक तेनात किये हुए है . पीस मिशन २०१० के नाम पर उसने कजाकिस्तान मे भी १००० से जयादा सेनिक तेनात किये हुए है . चीन की पाकिस्तान के साथ बढती यारी भी भारत के आँखों की किरकिरी है .गत सितम्बर मे चीन ने भारत पर साइबर हमले भी किये है ,यह बात खुद सुरक्षा सलाहकार एम .के .नारायणन ने स्वीकार की है . ऐसे हमले चीन अमेरिका और अन्य देशो पर भी कर चुका है . लेकिन यह तो चीन भी नहीं चाहेगा की भारत से युद्ध हो ,क्योकि दोनों ही देश विकास के नए आयाम स्थापित कर रहे है ,वे नहीं चाहेगे की किसी तबाही के कारण वे विश्व बिरादरी से पीछे हो जाए . मुंबई मे हुए आतंकी हमलो मे हमलावर भले ही पकिस्तान से आये थे ,पर उनके पास जो रायफल पायी गई वे चीन मे निर्मित थी . जिससे भारत के कान खड़े हो गए . और भारत सतर्क हो गया .उसने दो टूक शब्दों मे कहा की वह पाक आतंकियों का साथ देने वाले किसी भी देश को माफ़ नहीं करेगा . (3)तथ्य जिनसे चीन बिलबिला उठा .... * तिब्बत की स्वायता के लिए संघर्ष वाले दलाई लामा को नोबेल मिलने के बाद अब एक और चीनी लोकतंत्र समर्थक नेता लियु जियाबाओ (ग्यारह साल से चीन की जेल मे बंद ) को हाल ही मे २०१० का नोबेल शांति पुरस्कार मिला है .साम्यवादी चीन नहीं चाहता की उसका हाल भी विघटन के रूप मे सोवियत संघ जैसा हो . इस पुरस्कार का विरोध करने से चीन के काले चहरे को पूर्वे विश्व समुदाय ने देखा लिया है . * भारत की बढती आर्थिक और सामरिक ताकत ,अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशो से उसकी निकटता को चीन हजम नहीं कर पा रहा है .*आर्थिक मंदी के बाद भी भारत और चीन की विकास दरो मे अब केवल एक प्रतिशत का अंतर रहा गया है ,जो भारत के सफल विकास को दर्शाता है . चीन इसीसे खफा है . * भारत ने भी चीन की सीमांत गतिविधियों का जवाब देते हुए असम ,अरुणांचल आदि राज्यों मे मिसाइलो और विमानों की तेनाती के साथ साथ सड़क निर्माण का काम भी शुरू कर दिया है . यह बात भी चीन को अखर रही है . * भारत ने चीन के अवेध सामान सामानों से बाजारों को बचाने के लिए कई यूरोपीय देशो की तरह कड़े कदम उठाये है * १९८० मे इन्द्रा गाँधी द्वारा शुरू किये गए आपरेशन फाल्कन को भारत सरकार ने दूसरे नाम से शुरू करने की योजना बना ली है .जिसमे देश की सीमाओं पर १ लाख सेनिको की तेनाती की जाएगी . इस बात ने चीनी हलको मे सनसनी मचा दी है . (4)क्या वाकई ड्रेगन मे है दम ,या भारत है दबंग ? यह सत्य है की चीन की मिसाइल क्षमता हमसे कही ज्यादा है .लेकिन हम भी चीन के मुंबई ,यानी शंघ्याई पर निशाना लगा सकते है .२०१२ तक हम भी सम्पूर्ण चीन को अपनी मिसाइल जद मे कर लेंगे .थल सेना के हिसाब से चीन विश्व मे दूसरे ,भारत चोथे और पाकिस्तान १५ वे स्थान पर है .२५०० लड़ाकू विमानों के साथ चीनी वायु सेना ताकतवर जरुर है .लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय तकनीक के साथ १६०० विमानों वाली भारतीय वायु सेना विश्व की कुछ एक ताकतवर सेनाओं मे से एक .जिसका लोहा अमेरिका ,फ़्रांस ,इंग्लैंड रूस जैसे देश मान चुके है . हमारे पास विश्व की सेनाओं के साथ किये गए युद्ध अभ्यासों का और पकिस्तान के साथ विषम परिस्थितियों मे लड़ी गई २ जंगो का मजबूत अनुभव है .चीनी सेनाये किसी देश के साथ युद्ध अभ्यास नहीं कराती .न ही चीन किसी देश से कोई सामरिक समझोता कर हथियार खरीदता है . चीन के पास जल मे भले ही जहाज जयादा हो ,लेकिन एशिया का केवल एक एयर क्राफ्ट करियर भारत के पास है .डा .भरत झुनझुनवाला के अनुसार "चीन के आधे से जयादा जहाज युद्ध लायक स्थिति मे नहीं है" (शोध के बाद उनकी किताब मे लिखा )कई विदेशी जानकारों ने तो अपनी चीनी यात्रा के बाद यहाँ तक दावे किये है की चीन के गावो की हालत भारत के देहात से भी खराब है ,चीनी लोग केवल निर्माण जानते है सेवा के क्षेत्र मे सारी कम्पनिया विदेशी है .चीन के असली दावे यदि पता लगे तो कई क्षेत्रो मे तो वह भारत से भी पीछे है . चीन ने अपने नगरो जैसे बीजिंग ,ग्वान्झाओ ,सिचियांग नगरो का खूब विकास किया है .किन्तु विकास की इस दोड मे गाव पीछे छुट गए है ,जिनकी भनक चीन साम्यवादी होने के कारण विश्व समुदाय को नहीं लगने देता ,की कही लाल झंडे पर कोई दाग ना लग जाए . (५)आगाह करता पत्र:( चुनोती बनते चीन के प्रति आगाह करते हुए दूरदर्शी सरदार पटेल ने तात्कालिक प्रधानमंत्री नेहरु के नाम लिखे पत्र के कुछ अंश ) नई दिल्ली ७ नवम्बर १९५०मेरे प्रिय जवाहरलाल ,चीन ने हमें अपने शांति पूर्ण आडम्बरो मे उलझाने का नाटक किया है .चीन की अंतिम चाल कपट और विश्वासघात है .हम ही उनका मार्गदर्शन करते रहे ,अब वे हमें ही आँख दिखा रहे है .चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के विषय पर लिखे गए टेलीग्राफ की अशिष्ट भाषा किसी मित्र की नहीं ,भावी शत्रु की है .तिब्बत हमारे मित्र के रूप मे था ,अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए हमें उसका साथ तो देना ही होगा .चीन की द्रष्टि केवल तिब्बित पर ही नहीं बल्कि असम ,दार्जिलिंग और हमारे कई इलाको पर भी है .संचार की द्रष्टि से हम वहा बड़े ही कमजोर है ,देश की खातिर हमें इन बातो पर ध्यान देने की आवयश्कता है ,ताकि हमारी सीमाए अभेद बनी रहे . " आपका अपना वल्लभ भाई पटेल (गाँधी संग्रालय ,दिल्ली से साभार ) (6) क्या हो भारत की तेयारिया :*इस समय भारत के लिए पकिस्तान और चीन दो बड़े खतरे है .ये दोनों ही देश एक दूसरे के दोस्त है ,अत : भारत को दोनों के लिए एक जैसी ही सेन्य नीति बनानी होगी . * भारत को अपनी आर्थिक और सेन्य ताकत मे इजाफा करते हुए विश्व के अधिक से अधिक देशो का समर्थन जुटाना होगा . जो उसे सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता दिला सके .ताकि हम चीन को एक और झटका दे सके . *सामरिक क्षेत्रो मे उन्नत तकनीक और देश से भ्रष्टाचार को कम करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे . *हमारी विदेश नीति और कूटनीति को और भी कठोर बनाने और देश के नागरिको के हित मे काम करने की आव्य्श्यकता है . * स्वदेशी तकनीको का विकास कर चीनी माल को बाजारों से उखाड़ फेकना हमारा लक्ष्य होना चाहिए . ताकि लोग भी स्वदेशी की तरफ आकर्षित हो . (समाप्त )































