मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

चीन की चालाकी
















.॥(1)भारतीय नीति निर्माताओ को धीरे धीरे ही सही किन्तु यह समझ आ गया है की चीन उनकी भलमनसाहत को मज़बूरी समझ रहा है ।एक दो साल पहले तक जहा चीन की आलोचना को कुटनीतिक मर्यादाओ के खिलाफ माना जाता था ।वही भारतीय सरकार द्वारा अब उससे तू तू मे मे से परहेज नहीं किया जा रहा है . भारत द्वारा सामूहिक स्वर मे चीन को यह सन्देश देने की कोशिश की जा रही है की ड्रेगन भारत को कमजोर समझने की हिमाकत ना करे .यह तो जग जाहिर है की चीन और भारत का सीमाविवाद है और चीन समय समय पर भारत की तरक्की पर ब्रेक लगाने की कोशिश करता रहा है .जानकार तो यहाँ तक कहते ही भारत और चीन के बीच के रिश्ते परिपक्व दिखाई देते है लेकिन है नहीं. १९६२ की सी स्थिति पुन बनती नजर आ रही है .चीन भारत के लिए कितना खतरनाक हो सकता है ,भारत को क्या सावधानिया रखनी चाहिए . विश्लेषण कर रहे है स्वतंत्र पत्रकार केशव जांगिड .... (2)याद कीजिये की जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मे रक्षा मंत्री जार्ज फ्रानान्दिस ने चीन को भारत का दुश्मन नंबर एक बताया था तो चारो और हडकंप मच गया था .क्योकि भारत हिंदी चीनी भाई भाई की राह पर चल रहे था . लेकिन आज रिश्ते तेजी से बदले है . अब चीन की साम्राजवादी नीतियों को भापते हुए भारत भी चीन को आखे दिखाने लगा है .इसका सबसे बड़ा उदाहरण मिला पिछले दिनों जब रक्षा मंत्री एंटनी ने एक सेन्य कार्यक्रम मे यह कहा "की हमारे लिए पकिस्तान और चीन एक जैसे ही शत्रु है ". दरअसल चीन नहीं चाहता की एशिया मे उसके आलावा किसी और की भी हुकूमत हो . वह भारत को हमेशा अपने चिरपरिचित प्रतिदुंदी के रूप मे देखता आया है . भारत की तरक्की पर अंकुश लगाने के लिए उसने अमेरिका से हुए परमाणु प्रसार विधेयक को विश्व बिरादरी के सामने पारित होने से रोका , कश्मीरी लोगो को अलग वीजा दिया , एशियाई विकास बेंक द्वारा भारत को ऋण दिए जाने का विरोध किया यहाँ तक की नेपाल मे चीनी शासन वाली सरकार को चलने के लिए वहा के सांसदों को खरीदने तक की कोशिश की .कही ना कही चीन भी यह जनता है की आर्थिक महाशक्ति बनते भारत से सीधे मुकाबला करना टेडी खीर साबित होगा .अक्साई चीन पर कब्ज़ा ,पाक अधिकृत कश्मीर मे अपनी सेनाये भेजना ,तिब्बत मे भारतीय सीमा के पास रेल लाइन बिछाना इन बातो की तरफ इशारा करता है की चीन एशिया का अमेरिका बनने के सपने देख रहा है .लेकिन उसे यह चिंता भी है की यदि भारत ने उसके चिर प्रतिद्वदियो जैसे जापान ,ताइवान ,इंडोनेशिया ,दलाई लामा ,फिलीपींस ,हान्ग्कोंग से हाथ मिला लिया तो उसके सपने अधूरे रह जायेगे . भारत के अपने इन पड़ोसियों से मधुर सम्बन्ध है .चीन का तो यह भी कहना है की अरुणांचल नया ताइवान है ,जो चीन का ही हिस्सा है लेकिन भारत इस बात को सिरे से खारिज करते आया है . भारत से लगी सीमाओं पर चीन ने १०,००० से भी ज्यादा सेनिक तेनात किये हुए है . पीस मिशन २०१० के नाम पर उसने कजाकिस्तान मे भी १००० से जयादा सेनिक तेनात किये हुए है . चीन की पाकिस्तान के साथ बढती यारी भी भारत के आँखों की किरकिरी है .गत सितम्बर मे चीन ने भारत पर साइबर हमले भी किये है ,यह बात खुद सुरक्षा सलाहकार एम .के .नारायणन ने स्वीकार की है . ऐसे हमले चीन अमेरिका और अन्य देशो पर भी कर चुका है . लेकिन यह तो चीन भी नहीं चाहेगा की भारत से युद्ध हो ,क्योकि दोनों ही देश विकास के नए आयाम स्थापित कर रहे है ,वे नहीं चाहेगे की किसी तबाही के कारण वे विश्व बिरादरी से पीछे हो जाए . मुंबई मे हुए आतंकी हमलो मे हमलावर भले ही पकिस्तान से आये थे ,पर उनके पास जो रायफल पायी गई वे चीन मे निर्मित थी . जिससे भारत के कान खड़े हो गए . और भारत सतर्क हो गया .उसने दो टूक शब्दों मे कहा की वह पाक आतंकियों का साथ देने वाले किसी भी देश को माफ़ नहीं करेगा . (3)तथ्य जिनसे चीन बिलबिला उठा .... * तिब्बत की स्वायता के लिए संघर्ष वाले दलाई लामा को नोबेल मिलने के बाद अब एक और चीनी लोकतंत्र समर्थक नेता लियु जियाबाओ (ग्यारह साल से चीन की जेल मे बंद ) को हाल ही मे २०१० का नोबेल शांति पुरस्कार मिला है .साम्यवादी चीन नहीं चाहता की उसका हाल भी विघटन के रूप मे सोवियत संघ जैसा हो . इस पुरस्कार का विरोध करने से चीन के काले चहरे को पूर्वे विश्व समुदाय ने देखा लिया है . * भारत की बढती आर्थिक और सामरिक ताकत ,अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशो से उसकी निकटता को चीन हजम नहीं कर पा रहा है .*आर्थिक मंदी के बाद भी भारत और चीन की विकास दरो मे अब केवल एक प्रतिशत का अंतर रहा गया है ,जो भारत के सफल विकास को दर्शाता है . चीन इसीसे खफा है . * भारत ने भी चीन की सीमांत गतिविधियों का जवाब देते हुए असम ,अरुणांचल आदि राज्यों मे मिसाइलो और विमानों की तेनाती के साथ साथ सड़क निर्माण का काम भी शुरू कर दिया है . यह बात भी चीन को अखर रही है . * भारत ने चीन के अवेध सामान सामानों से बाजारों को बचाने के लिए कई यूरोपीय देशो की तरह कड़े कदम उठाये है * १९८० मे इन्द्रा गाँधी द्वारा शुरू किये गए आपरेशन फाल्कन को भारत सरकार ने दूसरे नाम से शुरू करने की योजना बना ली है .जिसमे देश की सीमाओं पर १ लाख सेनिको की तेनाती की जाएगी . इस बात ने चीनी हलको मे सनसनी मचा दी है . (4)क्या वाकई ड्रेगन मे है दम ,या भारत है दबंग ? यह सत्य है की चीन की मिसाइल क्षमता हमसे कही ज्यादा है .लेकिन हम भी चीन के मुंबई ,यानी शंघ्याई पर निशाना लगा सकते है .२०१२ तक हम भी सम्पूर्ण चीन को अपनी मिसाइल जद मे कर लेंगे .थल सेना के हिसाब से चीन विश्व मे दूसरे ,भारत चोथे और पाकिस्तान १५ वे स्थान पर है .२५०० लड़ाकू विमानों के साथ चीनी वायु सेना ताकतवर जरुर है .लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय तकनीक के साथ १६०० विमानों वाली भारतीय वायु सेना विश्व की कुछ एक ताकतवर सेनाओं मे से एक .जिसका लोहा अमेरिका ,फ़्रांस ,इंग्लैंड रूस जैसे देश मान चुके है . हमारे पास विश्व की सेनाओं के साथ किये गए युद्ध अभ्यासों का और पकिस्तान के साथ विषम परिस्थितियों मे लड़ी गई २ जंगो का मजबूत अनुभव है .चीनी सेनाये किसी देश के साथ युद्ध अभ्यास नहीं कराती .न ही चीन किसी देश से कोई सामरिक समझोता कर हथियार खरीदता है . चीन के पास जल मे भले ही जहाज जयादा हो ,लेकिन एशिया का केवल एक एयर क्राफ्ट करियर भारत के पास है .डा .भरत झुनझुनवाला के अनुसार "चीन के आधे से जयादा जहाज युद्ध लायक स्थिति मे नहीं है" (शोध के बाद उनकी किताब मे लिखा )कई विदेशी जानकारों ने तो अपनी चीनी यात्रा के बाद यहाँ तक दावे किये है की चीन के गावो की हालत भारत के देहात से भी खराब है ,चीनी लोग केवल निर्माण जानते है सेवा के क्षेत्र मे सारी कम्पनिया विदेशी है .चीन के असली दावे यदि पता लगे तो कई क्षेत्रो मे तो वह भारत से भी पीछे है . चीन ने अपने नगरो जैसे बीजिंग ,ग्वान्झाओ ,सिचियांग नगरो का खूब विकास किया है .किन्तु विकास की इस दोड मे गाव पीछे छुट गए है ,जिनकी भनक चीन साम्यवादी होने के कारण विश्व समुदाय को नहीं लगने देता ,की कही लाल झंडे पर कोई दाग ना लग जाए . (५)आगाह करता पत्र:( चुनोती बनते चीन के प्रति आगाह करते हुए दूरदर्शी सरदार पटेल ने तात्कालिक प्रधानमंत्री नेहरु के नाम लिखे पत्र के कुछ अंश ) नई दिल्ली ७ नवम्बर १९५०मेरे प्रिय जवाहरलाल ,चीन ने हमें अपने शांति पूर्ण आडम्बरो मे उलझाने का नाटक किया है .चीन की अंतिम चाल कपट और विश्वासघात है .हम ही उनका मार्गदर्शन करते रहे ,अब वे हमें ही आँख दिखा रहे है .चीन द्वारा तिब्बत पर कब्जे के विषय पर लिखे गए टेलीग्राफ की अशिष्ट भाषा किसी मित्र की नहीं ,भावी शत्रु की है .तिब्बत हमारे मित्र के रूप मे था ,अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए हमें उसका साथ तो देना ही होगा .चीन की द्रष्टि केवल तिब्बित पर ही नहीं बल्कि असम ,दार्जिलिंग और हमारे कई इलाको पर भी है .संचार की द्रष्टि से हम वहा बड़े ही कमजोर है ,देश की खातिर हमें इन बातो पर ध्यान देने की आवयश्कता है ,ताकि हमारी सीमाए अभेद बनी रहे . " आपका अपना वल्लभ भाई पटेल (गाँधी संग्रालय ,दिल्ली से साभार ) (6) क्या हो भारत की तेयारिया :*इस समय भारत के लिए पकिस्तान और चीन दो बड़े खतरे है .ये दोनों ही देश एक दूसरे के दोस्त है ,अत : भारत को दोनों के लिए एक जैसी ही सेन्य नीति बनानी होगी . * भारत को अपनी आर्थिक और सेन्य ताकत मे इजाफा करते हुए विश्व के अधिक से अधिक देशो का समर्थन जुटाना होगा . जो उसे सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता दिला सके .ताकि हम चीन को एक और झटका दे सके . *सामरिक क्षेत्रो मे उन्नत तकनीक और देश से भ्रष्टाचार को कम करने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे . *हमारी विदेश नीति और कूटनीति को और भी कठोर बनाने और देश के नागरिको के हित मे काम करने की आव्य्श्यकता है . * स्वदेशी तकनीको का विकास कर चीनी माल को बाजारों से उखाड़ फेकना हमारा लक्ष्य होना चाहिए . ताकि लोग भी स्वदेशी की तरफ आकर्षित हो . (समाप्त )










शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

हम ही दोषी ? खेल अच्छे होंगे ?

आज भारत अपनी ५००० साल पुरानी ताकत दिल्ली मे खेलो के आयोजन से दिखाने जा रहा है .हमने चीन की कितनी वाह वाही की थी २००८ मे । और कुछ दोषियों की कारण पूरे देश को ही दाव पर लगा दिया था । आज भारत चीन की राह पर चल रहा है । देश ही नहीं विदेशी भी भारत के रंग मे रंगते नजर आ रहे है । विश्वगुरु एक बार फिर ७२ देशो के साथ खड़ा है । हम जिस थाली मे खाते है उसी मे छेद कर देते है .चीन नए खूब गलतिय की लेकिन अपनी मिडिया तक नही आने दी , वो हमेशा ऐसा ही करता है । हमारी मीडिया नए अपने दायित्व निभाये है । लेकिन कई बार अपने स्वार्थो की पूर्ति भी करती नजर आई । अब सब भूलने का समय है .खेल अच्छे से हो जाए ,देश का नाम रोशन हो जाए । फिर देख लेंगे दोषियों को । कुश हू की मे भी मिडिया मे रहकर दिल्ली मे कवरेज कर रहा हू .... केशव जांगिड (लेखक और पत्रकार )

सोमवार, 13 सितंबर 2010

हिंदी की पुण्यतिथि कार्यक्रम

नमस्कार , कल बड़ा ही पावन दिन है । कल हम हिंदी की पुण्यतिथि मन रहे है । हमारे बाल क्लब और पत्रिका के आफिस मे भी कई कार्यक्रम आयोजिन हो रहे है । आप भी हिंदी की शोक सभा मे आ सकते है .इसके लिए कोई शुल्क नहीं होगा । लेकिन आपका वास्ता ऐसे वर्ग से होने चाहिए , जो हिंदी के नाम पर खाते हो और अग्रेजी के गुण गाते हो । अगर आप उस वर्ग से है तो आपको हिंदी की तस्वीर पर आसू बहाने का भी सोभाग्य मिलेगा । ऐसे युवा भी इस सम्मलेन मे आमंत्रित होंगे जो एफ. एम .की भाषा को पूरी तरह अग्रेजी करने के पक्ष मे है ।
अगर आप अन्य भाषाओं मे के हिमायती है और चाहते है की हिंदी को राज भाषा का दर्जा ना मिले ,आप सादर आमंत्रित है । संपर्क करे ... केशव जांगिड .... (आप जैसा ही हिंदी का हत्यारा )
फोन :९२१०५००१६३ , स्थान : हिंदी आबरू केंद्र ,न्यू डेल्ही

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

हिंदी आकादमी को बचाए ?

आज हम हिंदी आकादमी कि बात करते है . कुछ ऐसी बाते सामने आई है जो हिंदी कि अकादमी कि साख पर कालिक पोतने का काम करती है . पिछले दिनों जब हिंदी आकादमी के कार्यक्रम लोक बिम्ब (त्रिवेणी सभागार,दिल्ली ) चल रहा था . तब उनके एक कर्मचारी डा .लोकेश कि दिल का दोरा पड़ने से मोत हो गई थी ,आज वह विवादों में है . यह बात अब उड़ रही है कि उन्हें अपने आफिस में काम तक नहीं करने दिया जाता था .बहुत जय्यदा परेशान किया जाता था .इस कारण उनकी मोत हो गई . आकादमी में कई ऐसे काम होते है जो साहित्यिक तो बिलकुल नहीं है . ३० अप्रेल तक यहाँ सचिव कि नियुक्ति होनी है .हिंदी आकादमी के कर्मचारी ही त्राहिमाम कर रहे है वे नहीं चाहते कि कार्यवाहक सचिव फिर से आकर जंगल राज फेलादे . डा. लोकेश कि पत्नी से भी जबरदस्ती बंद कमरे में हलफनामे पर दस्तखत कराये गए . यह बात विश्वस्त सूत्रों से पता लगी है . मुख्य मंत्री शीला दीक्षित को तो यह कुछ भी नहीं पता होगा ,क्योकि उनके और उपाध्यक्ष श्री चक्रधर के सामने कुछ बाते तो आ ही नहीं पाती . यहाँ तक कि आकादमी कि महिला कर्मचारियों से तो बदतमीजी से बात कि जाती है . विष्णु प्रभाकर जी कि जनम तिथि पर सचिव महोदय तो एक महिला कर्मचारी से यहाँ तक कहा गए कि में तुझे देख लुगा ,ख़तम कर दूंगा ..आपके सामने यह बात इसलिए राखी जारही है कि जब आप हिंदी अकादमी के कार्यकर्मो में जाते है ,या साहित्यकार जब पुरूस्कार लेते है खूब आरोप लगते है , आज इसे सुधरने का मोका हमारे पास है ,क्योना कोई ऐसे सचिव को भेजे जो इस साहित्य संस्था को राजनीतीकारण से बचा सके, और ऐसी नोबत फिर नाए कि एक साहित्यिक संस्था को आखाडा बना दिया जाए . अगर आप के आसपास कोई ऐसा व्यक्ति हो जो इन योग्यताओं को रखता हो ,तो उसे हिंदी आकदमी में सचिव के लिए आवेदन कैने को ३० अप्रेल से पहले कहे . वह हिंदी पी . एच .डी. हो .सरकारी नोकरी में ८-१० साल तक ८,००० के वेतन पर रहा हो . प्रशाशनिक अनुभव हो .अपनी पतिक्रिया जरुर दे , क्या पता हम हिंदी साहित्य कि इस अमूल्य धरोहर को बचा सके , नहीं तो एक बार फिर जंगल राज आ जायेगा ,ये सचिव जीके ही कथन है जो बाहर नहीं आ पाते है कि ,, पञ्च साल के लिए आने दो सबको देख लेगे ..

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

मेरी पसंदीदा कहानी

प्रेमचंद की कहानी - गैरत की कटार

कितनी अफ़सोसनाक, कितनी दर्दभरी बात है कि वही औरत जो कभी हमारे पहलू में बसती थी उसी के पहलू में चुभने के लिए हमारा तेज खंजर बेचैन हो रहा है। जिसकी आंखें हमारे लिए अमृत के छलकते हुए प्याले थीं वही आंखें हमारे दिल में आग और तूफान पैदा करें! रूप उसी वक्त तक राहत और खुशी देता है जब तक उसके भीतर एक रूहानी नेमत होती हैं और जब तक उसके अन्दर औरत की वफ़ा की रूह.हरकत कर रही हो वर्ना वह एक तकलीफ़ देने चाली चीज़ है, ज़हर और बदबू से भरी हुई, इसी क़ाबिल कि वह हमारी निगाहों से दूर रहे और पंजे और नाखून का शिकार बने। एक जमाना वह था कि नईमा हैदर की आरजुओं की देवी थी, यह समझना मुश्किल था कि कौन तलबगार है और कौन उस तलब को पूरा करने वाला। एक तरफ पूरी-पूरी दिलजोई थी, दूसरी तरफ पूरी-पूरी रजा। तब तक़दीर ने पांसा पलटा। गुलो-बुलबुल में सुबह की हवा की शरारतें शुरू हुईं। शाम का वक्त था। आसमान पर लाली छायी हुई थी। नईमा उमंग और ताजुगी और शौक से उमड़ी हुई कोठे पर आयी। शफ़क़ की तरह उसका चेहरा भी उस वक्त खिला हुआ था। ऐन उसी वक्त वहां का सूबेदार नासिर अपने हवा की तरह तेज घोड़े पर सवार उधर से निकला, ऊपर निगाह उठी तो हुस्न का करिश्मा नजर आया कि जैसे चांद शफ़क़ के हौज में नहाकर निकला है। तेज़ निगाह जिगर के पार हुई। कलेजा थामकर रह गया। अपने महल को लौटा, अधमरा, टूटा हुआ। मुसाहबों ने हकीम की तलाश की और तब राह-रास्म पैदा हुई। फिर इश्क की दुश्वार मंज़िलों तय हुईं। वफ़ा ओर हया ने बहुत बेरुखी दिखायी। मगर मुहब्बत के शिकवे और इश्क़ की कुफ्र तोड़नेवाली धमकियां आखिर जीतीं। अस्मत का खलाना लुट गया। उसके बाद वही हुआ जो हो सकता था। एक तरफ से बदगुमानी, दूसरी तरफ से बनावट और मक्कारी। मनमुटाव की नौबत आयी, फिर एक-दूसरे के दिल को चोट पहुँचाना शुरू हुआ। यहां तक कि दिलों में मैल पड़ गयी। एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गये। नईमा ने नासिर की मुहब्बत की गोद में पनाह ली और आज एक महीने की बेचैन इन्तजारी के बाद हैदर अपने जज्बात के साथ नंगी तलवार पहलू में छिपाये अपने जिगर के भड़कते हूए शोलों को नईमा के खून से बुझाने के लिए आया हुआ है।



आधी रात का वक्त था और अंधेरी रात थी। जिस तरह आसमान के हरमसरा में हुसन के सितारे जगमगा रहे थे, उसी तरह नासिर का हरम भी हुस्न के दीपों से रोशन था। नासिर एक हफ्ते से किसी मोर्चे पर गया हुआ है इसलिए दरबान गाफ़िल हैं। उन्होंने हैदर को देखा मगर उनके मुंह सोने-चांदी से बन्द थे। ख्वाजासराओं की निगाह पड़ी लेकिन वह पहले ही एहसान के बोझ से दब चुके थे। खवासों और कनीजों ने भी मतलब-भरी निगाहों से उसका स्वागत किया और हैदर बदला लेने के नशे में गुनहगार नईमा के सोने के कमरे में जा पहुँचा, जहां की हवा संदल और गुलाब से बसी हुई थी।
कमरे में एक मोमी चिराग़ जल रहा था और उसी की भेद-भरी रोशनी में आराम और तकल्लुफ़ की सजावटें नज़र आती थीं जो सतीत्व जैसी अनमोल चीज़ के बदले में खरीदी गयी थीं। वहीं वैभव और ऐश्वर्य की गोद में लेटी हुई नईमा सो रही थी।
हैदर ने एक बार नईया को ऑंख भर देखा। वही मोहिनी सूरत थी, वही आकर्षक जावण्य और वही इच्छाओं को जगानेवाली ताजगी। वही युवती जिसे एक बार देखकर भूलना असम्भव था।
हॉँ, वही नईमा थी, वही गोरी बॉँहें जो कभी उसके गले का हार बनती थीं, वही कस्तूरी में बसे हुए बाल जो कभी कन्धों पर लहराते थे, वही फूल जैसे गाल जो उसकी प्रेम-भरी आंखों के सामने लाल हो जाते थे। इन्हीं गोरी-गोरी कलाइयों में उसने अभी-अभी खिली हुई कलियों के कंगन पहनाये थे और जिन्हें वह वफा के कंगन समझ था। इसकी गले में उसने फूलों के हार सजाये थे और उन्हें प्रेम का हार खयाल किया था। लेकिन उसे क्या मालूम था कि फूलों के हार और कलियों के कंगन के साथ वफा के कंगन और प्रेम के हार भी मुरझा जायेंगे।
हां, यह वही गुलाब के-से होंठ हैं जो कभी उसकी मुहब्बत में फूल की तरह खिल जाते थे जिनसे मुहब्बत की सुहानी महक उड़ती थी और यह वही सीना है जिसमें कभी उसकी मुहब्बत और वफ़ा का जलवा था, जो कभी उसके मुहब्बत का घर था।
मगर जिस फूल में दिल की महक थी, उसमें दग़ा के कांटे हैं।



हैदर ने तेज कटार पहलू से निकाली और दबे पांव नईमा की तरफ़ आया लेकिन उसके हाथ न उठ सके। जिसके साथ उम्र-भर जिन्दगी की सैर की उसकी गर्दन पर छुरी चलाते हुए उसका हृदय द्रवित हो गया। उसकी आंखें भीग गयीं, दिल में हसरत-भरी यादगारों का एक तूफान-सा तक़दीर की क्या खूबी है कि जिस प्रेम का आरम्भ ऐसा खुशी से भरपूर हो उसका अन्त इतना पीड़ाजनक हो। उसके पैर थरथराने लगे। लेकिन स्वाभिमान ने ललकारा, दीवार पर लटकी हुई तस्वीरें उसकी इस कमज़ोरी पर मुस्करायीं।
मगर कमजोर इरादा हमेशा सवाल और अलील की आड़ लिया करता है। हैदर के दिल में खयाल पैदा हुआ, क्या इस मुहब्बत के बाब़ को उजाड़ने का अल्ज़ाम मेरे ऊपर नहीं है? जिस वक्त बदगुमानियों के अंखुए निकले, अगर मैंने तानों और धिक्कारों के बजाय मुहब्बत से काम लिया होता तो आज यह दिन न आता। मेरे जुल्मों ने मुहब्बत और वफ़ा की जड़ काटी। औरत कमजोर होती है, किसी सहारे के बग़ैर नहीं रह सकती। जिस औरत ने मुहब्बत के मज़े उठाये हों, और उल्फ़ात की नाजबरदारियां देखी हों वह तानों और जिल्लतों की आंच क्या सह सकती है? लेकिन फिर ग़ैरत ने उकसाया, कि जैसे वह धुंधला चिराग़ भी उसकी कमजोरियों पर हंसने लगा।
स्वाभिमान और तर्क में सवाल-जवाब हो रहा था कि अचानक नईमा ने करवट बदली ओर अंगड़ाई ली। हैदर ने फौरन तलवार उठायी, जान के खतरे में आगा-पीछा कहां? दिल ने फैसला कर लिया, तलवार अपना काम करनेवाली ही थी कि नईमा ने आंखें खोल दीं। मौत की कटार सिर पर नजर आयी। वह घबराकर उठ बैठी। हैदर को देखा, परिस्थिति समझ में आ गयी। बोली-हैदर!



हैदर ने अपनी झेंप को गुस्से के पर्दे में छिपाकर कहा- हां, मैं हूँ हैदर!
नईमा सिर झुकाकर हसरत-भरे ढंग से बोली—तुम्हारे हाथों में यह चमकती हुई तलवार देखकर मेरा कलेजा थरथरा रहा है। तुम्हीं ने मुझे नाज़बरदारियों का आदी बना दिया है। ज़रा देर के लिए इस कटार को मेरी ऑंखें से छिपा लो। मैं जानती हूँ कि तुम मेरे खून के प्यासे हो, लेकिन मुझे न मालूम था कि तुम इतने बेरहम और संगदिल हो। मैंने तुमसे दग़ा की है, तुम्हारी खतावार हूं लेकिन हैदर, यक़ीन मानो, अगर मुझे चन्द आखिरी बातें कहने का मौक़ा न मिलता तो शायद मेरी रूह को दोज़ख में भी यही आरजू रहती। मौत की सज़ा से पहले आपने घरवालों से आखिरी मुलाक़ात की इजाज़त होती है। क्या तुम मेरे लिए इतनी रियायत के भी रवादार न थे? माना कि अब तुम मेरे लिए कोई नहीं हो मगर किसी वक्त थे और तुम चाहे अपने दिल में समझते हो कि मैं सब कुछ भूल गयी लेकिन मैं मुहब्बत को इतनी जल्दी भूल जाने वाली नहीं हूँ। अपने ही दिल से फैसला करो। तुम मेरी बेवफ़ाइयां चाहे भून जाओ लेकिन मेरी मुहब्बत की दिल तोड़नेवाली यादगारें नहीं मिटा सकते। मेरी आखिरी बातें सुन लो और इस नापाक जिन्दगी का हिस्सा पाक करो। मैं साफ़-साफ़ कहती हूँ इस आखिरी वक्त में क्यों डरूं। मेरी कुछ दुर्गत हुई है उसके जिम्मेदार तुम हो। नाराज न होना। अगर तुम्हारा ख्य़ाल है कि मैं यहां फूलों की सेज पर सोती हूँ तो वह ग़लत है। मैंने औरत की शर्म खोकर उसकी क़द्र जानी है। मैं हसीन हूं, नाजुक हूं; दुनिया की नेमतें मेरे लिए हाज़िर हैं, नासिर मेरी इच्छा का गुलाम है लेकिन मेरे दिल से यह खयाल कभी दूर नहीं होता कि वह सिर्फ़ मेरे हुस्न और अदा का बन्दा है। मेरी इज्जत उसके दिल में कभी हो भी नहीं सकती। क्या तुम जानते हो कि यहां खवासों और दूसरी बीवियों के मतलब-भरे इशारे मेरे खून और जिगर को नहीं लजाते? ओफ्, मैंने अस्मत खोकर अस्मत की क़द्र जानी है लकिन मैं कह चुकी हूं और फिर कहती हूं, कि इसके तुम जिम्मेदार हो।
हैदर ने पहलू बदलकर पूछा—क्योंकर?
नईमा ने उसी अन्दाज से जवाब दिया-तुमने बीवी बनाकर नहीं, माशूक बनाकर रक्खा। तुमने मुझे नाजुबरदारियों का आदी बनाया लेकिन फ़र्ज का सबक नहीं पढ़ाया। तुमने कभी न अपनी बातों से, न कामों से मुझे यह खयाल करने का मौक़ा दिया कि इस मुहब्बत की बुनियाद फ़र्ज पर है, तुमने मुझे हमेशा हुसन और मस्तियों के तिलिस्म में फंसाए रक्खा और मुझे ख्वाहिशों का गुलाम बना दिया। किसी किश्ती पर अगर फ़र्ज का मल्लाह न हो तो फिर उसे दरिया में डूब जाने के सिवा और कोई चारा नहीं। लेकिन अब बातों से क्या हासिल, अब तो तुम्हारी गैरत की कटार मेरे खून की प्यासी है ओर यह लो मेरा सिर उसके सामने झुका हुआ है। हॉँ, मेरी एक आखिरी तमन्ना है, अगर तुम्हारी इजाजत पाऊँ तो कहूँ।
यह कहते-कहते नईमा की आंखों में आंसुओं की बाढ़ आ गई और हैदर की ग़ैरत उसके सामने ठहर न सकी। उदास स्वर में बोला—क्या कहती हो?
नईमा ने कहा-अच्छा इजाज़त दी है तो इनकार न करना। मुझें एक बार फिर उन अच्छे दिनों की याद ताज़ा कर लेने दो जब मौत की कटार नहीं, मुहब्बत के तीर जिगर को छेदा करते थे, एक बार फिर मुझे अपनी मुहब्बत की बांहों में ले लो। मेरी आख़िरी बिनती है, एक बार फ़िर अपने हाथों को मेरी गर्दन का हार बना दो। भूल जाओ कि मैंने तुम्हारे साथ दगा की है, भूल जाओ कि यह जिस्म गन्दा और नापाक है, मुझे मुहब्बत से गले लगा लो और यह मुझे दे दो। तुम्हारे हाथों में यह अच्छी नहीं मालूम होती। तुम्हारे हाथ मेरे ऊपर न उठेंगे। देखो कि एक कमजोर औरत किस तरह ग़ैरत की कटार को अपने जिगर में रख लेती है।
यह कहकर नईमा ने हैदर के कमजोर हाथों से वह चमकती हुई तलवार छीन ली और उसके सीने से लिपट गयी। हैदर झिझका लेकिन वह सिर्फ़ ऊपरी झिझक थी। अभिमान और प्रतिशोध-भावना की दीवार टूट गयी। दोनों आलिंगन पाश में बंध गए और दोनों की आंखें उमड़ आयीं।
नईमा के चेहरे पर एक सुहानी, प्राणदायिनी मुस्कराहट दिखायी दी और मतवाली आंखों में खुशी की लाली झलकने लगी। बोली-आज कैसा मुबारक दिन है कि दिल की सब आरजुएं पूरीद होती हैं लेकिन यह कम्बख्त आरजुएं कभी पूरी नहीं होतीं। इस सीने से लिपटकर मुहब्बत की शराब के बगैर नहीं रहा जाता। तुमने मुझे कितनी बार प्रेम के प्याले हैं। उस सुराही और उस प्याले की याद नहीं भूलती। आज एक बार फिर उल्फत की शराब के दौर चलने दो, मौत की शराब से पहले उल्फ़त की शराब पिला दो। एक बार फिर मेरे हाथों से प्याला ले लो। मेरी तरफ़ उन्हीं प्यार की निगाहों से दंखकर, जो कभी आंखों से न उतरती थीं, पी जाओ। मरती हूं तो खुशी से मरूं।
नईमा ने अगर सतीत्व खोकर सतीत्व का मूल्य जाना था, तो हैदर ने भी प्रेम खोकर प्रेम का मूल्य जाना था। उस पर इस समय एक मदहोशी छायी हुई थी। लज्जा और याचना और झुका हुआ सिर, यह गुस्से और प्रतिशोध के जानी दुश्मन हैं और एक गौरत के नाजुक हाथों में तो उनकी काट तेज तलवार को मात कर देती है। अंगूरी शराब के दौर चले और हैदर ने मस्त होकर प्याले पर प्याले खाली करने शुरू किये। उसके जी में बार-बार आता था कि नईमा के पैरों पर सिर रख दूं और उस उजड़े हुए आशियाने को आदाब कर दूं। फिर मस्ती की कैफ़्रियत पैदा हुई और अपनी बातों पर और अपने कामों पर उसे अख्य़ियार न रहा। वह रोया, गिड़गिड़ाया, मिन्नतें कीं, यहां तक कि उन दग़ा के प्यालों ने उसका सिर झुका दिया।



हैदर कई घण्टे तक बेसुध पड़ा रहा। वह चौंका तो रात बहुत कम बाक़ी रह गयी थी। उसने उठना चाहा लेकिन उसके हाथ-पैर रेशम की डोरियों से मजबूत बंधे हुए थे। उसने भौचक होकर इधर-उधर देखा। नईमा उसके सामने वही तेज़ कटार लिये खड़ी थी। उसके चेहरे पर एक क़ातिलों जैसी मुसकराहट की लाली थी। फ़र्जी माशूक के खूनीपन और खंजरबाजी के तराने वह बहुत बार गा चुका था मगर इस वक्त उसे इस नज्जारे से शायराना लुत्फ़ उठाने का जीवट न था। जान का खतरा, नशे के लिए तुर्शी से ज्यादा क़ातिल है। घबराकर बोला-नईम!
नईमा ने लहजे में कहा-हां, मैं हूं नईमा।
हैदर गुस्से से बोला-क्या फिर दग़ा का वार किया?
नईमा ने जवाब दिया-जब वह मर्द जिसे खुदा ने बहादुरी और क़ूवत का हौसला दिया है, दग़ा का वार करता है तो उसे मुझसे यह सवाल करने का कोई हक़ नहीं। दग़ा और फ़रेब औरतों के हथियार हैं क्योंकि औरत कमजोर होती है। लेकिन तुमको मालूम हो गया कि औरत के नाजुक हाथों में ये हथियार कैसी काट करते हैं। यह देखो-यह आबदार शमशीर है, जिसे तुम ग़ैरत की कटार कहते थे। अब वह ग़ैरत की कटार मेरे जिगर में नहीं, तुम्हारे जिगर में चुभेगी। हैंदर, इन्सान थोड़ा खोकर बहुत कुछ सीखता है। तुमने इज्जत और आबरू सब कुछ खोकर भी कुछ न सीखा। तुम मर्द थे। नासिर से तुम्हारी होड़ थी। तुम्हें उसके मुक़ाबिले में अपनी तलवार के जौहर दिखाना था लेकिन तुमने निराला ढंग अख्तियार किया और एक बेकस और पर दग़ा का वार करना चाहा और अब तुम उसी औरत के समाने बिना हाथ-पैर के पड़े हुए हो। तुम्हारी जान बिलकुल मेरी मुट्ठी में है। मैं एक लहमे में उसे मसल सकती हूं और अगर मैं ऐसा करूं तो तुम्हें मेरा शुक्रगुज़ार होना चाहिये क्योंकि एक मर्द के लिए ग़ैरत की मौत बेग़ैरती की जिन्दगी से अच्छी है। लेकिन मैं तुम्हारे ऊपर रहम करूंगी: मैं तुम्हारे साथ फ़ैयाजी का बर्ताव करूंगी क्योंकि तुम ग़ैरत की मौत पाने के हक़दार नहीं हो। जो ग़ैरत चन्द मीठी बातों और एक प्याला शराब के हाथों बिक जाय वह असली ग़ैरत नहीं है। हैदर, तुम कितने बेवकूफ़ हो, क्या तुम इतना भी नहीं समझते कि जिस औरत ने अपनी अस्मत जैसी अनमोल चीज देकर यह ऐश ओर तकल्लुफ़ पाया वह जिन्दा रहकर इन नेमतों का सुख जूटना चाहती है। जब तुम सब कुछ खोकर जिन्दगी से तंग नहीं हो तो मैं कुछ पाकर क्यों मौत की ख्वाहिश करूं? अब रात बहुत कम रह गयी है। यहां से जान लेकर भागो वर्ना मेरी सिफ़ारिश भी तुम्हें नासिर के गुस्से की आग से रन बचा सकेगी। तुम्हारी यह ग़ैरत की कटार मेरे क़ब्जे में रहेगी और तुम्हें याद दिलाती रहेगी कि तुमने इज्जत के साथ ग़ैरत भी खो दी।

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

डा .जयप्रकाश गुप्त ने दिया हिंदी को एक ज्वलंत आलेख

एक हत्यारा था कॉंग्रेस का संस्थापक(लेखक केशव जांगिड की तरफ से शुभकामनाये)
इंडियन नेशनल कांग्रेस के संस्थापक थे इंग्लैण्ड में सन् 1829 में जन्मे मि. एलन आक्टेवियन ह्रूम। यह शायद बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि कांग्रेस के संस्थापक ने 1857 में अंग्रेजों की सत्ता के विरुद्ध भड़के विद्रोह के दौरान इटावा व आगरा में अपने हाथों से अनेक स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रभक्तों की हत्या की थी। महीनों तक ए. ओ. ह्रूम भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के विरुद्ध सक्रिय रहे थे। आधुनिकतम शस्त्रों व तोपों के बल पर राष्ट्रभक्त ग्रामीणों व भारतीय सिपाहियों को कुचलने में उन्होंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

ये सनसनीखेज रहस्योद्घाटन लगभग सौ वर्ष पूर्व संवत् 1973 में प्रकाशित सर विलियम बेडरवर्न द्वारा लिखित"काँग्रेस के पिता- एलन आक्टेवियन ह्रूम" पुस्तक में किया गया है। मूलत: अंग्रेजी की इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद दयाचन्द गोयलीय तथा चिरंजी लाल माथुर ने किया था। पुस्तक का प्रकाशन हिन्दी गौरव ग्रंथ माला, बम्बई द्वारा किया गया था। यह ऐतिहासिक पुस्तक उन्हें हाल ही में अपने पिताश्री भक्त रामशरणदास जी के संग्रहालय में सुरक्षित पुस्तकों में मिली।

पुस्तक में पृष्ठ 8 पर कहा गया है- "एलन ह्रूम सन् 1849 ई. में बंगाल सिविल सर्विस में भरती हुए। उस समय उनकी अवस्था 20 वर्ष थी। उन्हें हिन्दुस्थान में आये अभी आठ वर्ष भी न बीते थे कि 1857 में गदर मच गया और उनको अपनी सैनिक वीरता और शासन की योग्यता के प्रकट करने का मौका मिला। उनकी जल्दी-जल्दी पदोन्नति होती गई। उनकी केवल 26 वर्ष की अवस्था थी जब वे इटावा जिले के प्रधान सिविल अफसर (कलेक्टर) थे।

जब सन् 1857 का मई का महीना प्रारंभ हुआ तब किसी प्रकार की भी शंका नहीं थी। सब काम ठीक-ठाक चल रहा था। अपराध कम होते जा रहे थे। लगान और मालगुजारी आसानी से वसूल हो जाती थी। ऐसी अवस्था में ही 10 मई को एकाएक तूफान आ गया। मेरठ में घुड़सवार सेना ने हमला कर दिया। दो दिन के अन्दर इटावा में भी इस उपद्रव के समाचार पहुंच गये। एक-दो दिन बाद थोड़ी सी फौज भी आ गई। जबरदस्त मुकाबले के बाद बहुत से बागी तो कैद कर लिए गये और बहुत से मार डाले गये।" इसके बाद जो कुछ हुआ उसे एक अन्य अंग्रेजी अधिकारी काये ने अपनी पुस्तक "सिपाही विद्रोह" में लिखा है। ह्रूम साहब की उन्होंने बड़ी प्रशंसा की है।

काये लिखते हैं-

"उस समय ह्रूम साहब इटावा में मजिस्ट्रेट व कलेक्टर थे। लोकोपकार और वीरता आदि गुण उन्होंने अपने पिता से पैतृक सम्पत्ति के तौर पर प्राप्त किये थे। 18 तथा 19 मई को उसी सेना के "भगोड़ों" अर्थात हिन्दुस्थानी सिपाहियों का दूसरा दल इटावा से 10 मील की दूरी पर जसवंत नगर में आ पहुँचा। जब पुलिस के सिपाहियों ने अधीनता स्वीकार करने को कहा तो उन्होंने कुछ सिपाहियों को गोली से मार डाला। बागी एक हिन्दू मंदिर पर कब्जा करके वहां से अपना बचाव करने लगे। जब ह्रूम साहब ने यह खबर सुनी तो उन्होंने तुरन्त अपनी बग्घी मंगवाई और गोली, बारूद, तमंचा, बन्दूक वगैरह तमाम हथियार लेकर अपने सहायक कर्मचारी मिस्टर डेनियल सहित रवाना हो गये।"

आगे लिखा है, "ह्रूम साहब कुछ सिपाहियों को साथ लेकर मंदिर के सामने जा डटे। कठिनाई यह थी कि स्थानीय लोग बागियों की तरफ थे। जब दिन ढल गया और सूर्य अस्त होने लगा तब केवल इन दोनों अंग्रेज अफसरों ने ही एक पुलिस सिपाही को साथ लेकर उस मंदिर पर छापा मारा। इस दौरान पुलिस का सिपाही गोली से मर गया और डेनियल के चेहरे में से होकर गोली पार हो गई। ह्रूम ने बड़ी वीरता से डेनियल को बचाकर गाड़ी तक पहुँचाया। इस दौरान उन्होंने एक बागी को जान से मार डाला तथा दूसरे को अधमरा कर दिया। इसी से घबराकर बागी लोग रात को भाग निकले।"

काये लिखते हैं- इससे अंग्रेज जाति की वीरता और धीरता का अच्छी तरह पता चलता है। ह्रूम साहब और उनके सहायक डेनियल ने बागी लोगों के सामने ही उन लोगों से बदला लिया जिन्होंने कुछ दिन पहले अंग्रेजों को मार डाला था।

लेखक इटावा के हिन्दुस्थानी सैनिकों द्वारा मई के इस स्वाधीनता संग्राम में पूरी तरह सक्रियता से जुटने की चर्चा करते हुए लिखता है- "इटावा की सेना ने भी उपद्रव मचा दिया, खजाना लूट लिया, बंगले जला दिये। जेलों में से तमाम कैदी मुक्त करा दिये। अंग्रेज मेमों को राजभक्त कर्मचारियों के साथ चुपचाप आगरा के किले में पहुंचा दिया गया।" लेकिन भारतीय सैनिकों की वीरता से ह्रूम इतना डर गया था कि पहले तो उसने मेज के नीचे छिपकर जान बचाई और बाद में 17 जून को ह्रूम महिला का वेश बनाकर रात के समय इटावा से चुपचाप आगरा भागने को मजबूर हो गया था- यह इस पुस्तक के लेखक ने नहीं बताया। क्योंकि वह ह्रूम को वीर साहसी सिद्ध करना चाहता था।

5 जुलाई को आगरा में स्वाधीनता सेनानी हिन्दुस्थानी सैनिकों तथा अंग्रेजों की सेना के बीच हुए युद्ध का वर्णन निम्न शब्दों में किया गया है-

"बागियों में दो हजार अच्छे-सधे सिपाही थे और एक फौज बंगाल के तोपखाने की थी। यहां बड़ा युद्ध हुआ और इसमें बहुत से अफसर काम आए। ह्रूम साहब बराबर तोपखाने के साथ काम करते रहे। कर्नल पैट्रिक बैनरमैन ने कहा था, "ह्रूम साहब जैसे साहसी वीर मैंने बहुत कम देखे हैं। वे कई रातों तक खुली हवा में तोपों के साथ रहे। यहां तक कि हैजे ने उन्हें परेशान किया और उन्हें बीमार होकर किले में जाना पड़ा।"

ह्रूम कई माह तक आगरा में ही चुपचाप दुबके रहे। जनवरी में उन्होंने पुन: वापस पहुंचकर इटावा को कब्जे में लेने का प्रयास किया। 7 फरवरी 1858 को इटावा के पास अनंतराम में विद्रोहियों व अंग्रेजों की सेना के बीच हुए युद्ध में ह्रूम ने तोपों के गोलों से किस प्रकार स्वधीनता समर्थकों पर कहर ढाया इसका विषद वर्णन किया गया है।

प्रधान सेनापति ने लार्ड केनिंग को भेजी रपट में लिखा- "मि. ह्रूम और कप्तान एल्किजेन्डर ने बड़ी वीरता से काम किया। इस लड़ाई का नतीजा यह हुआ कि 131 बागी मारे गये और उनके घोड़े, तोपें, गोला बारूद- हथियार अंग्रेजी सेना के हाथ आये।

हमने अजीत महल में रूपसिंह के एक दल पर बड़े जोर से धावा किया, जिसमें पूर्ण सफलता पाई। शत्रुओं को भागना पड़ा उनके सात आदमी गड्ढों में गिरकर मर गये। दूसरे दिन हमने दोपहर को शत्रु पर फिर छापा मारा। 15 को काट डाला और तीन को पकड़ कर फाँसी पर चढ़ा दिया।"

स्वयं ह्रूम ने आगे लिखा है- "हमने बागियों की अपने से कहीं बड़ी फौज को हरा दिया। उनकी तोपें व सामान छीन लिया और उनके 81 सधे हुए सिपाहियों को मार डाला।"

उपरोक्त तथ्यात्मक विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इंडियन कांग्रेस के जन्मदाता ए.ओ. ह्रूम ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभक्त हिन्दुस्थानी सिपाहियों व ग्रामीणों पर कहर बरपाने में कोई संकोच नहीं किया था। उन्होंने लगभग एक वर्ष तक उन्हें शत्रु मानकर उनसे संघर्ष किया, उनकी हत्या करने में संकोच नहीं किया। इन्हीं ए.ओ. ह्रूम ने 1885 में कांग्रेस की स्थापना की।

आगे चलकर 18 मार्च, 1894 को बम्बई में आयोजित अपने विदाई अभिनंदन समारोह में कांग्रेस संस्थापक ए.ओ. ह्रूम ने अपने भाषण में भारतवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा- "यदि दुर्भाग्य से यूरोप में विश्व युद्ध हो जाए तो भारतवासियों के लिए यही उपयुक्त है कि वे एक होकर बिना किसी सोच-विचार के ब्रिटिश जाति की सहायता करें। यद्यपि इस (अंग्रेज) जाति में अनेक कमियाँ हैं तथापि यह सभ्य और शिष्ट जाति है। जो कुछ तुमने प्राप्त किया है वह सब इसी के प्रताप से किया है। अत: यही उचित है कि ऐसे युद्ध के समय में एक होकर ब्रिटिश टापू की रक्षा करो जो स्वतंत्रता का केन्द्र है।"

ए ओ ह्यूम की पोल खोलते हुए महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर ने भी लिखा है:

ए.ओ. ह्रूम इटावा के मजिस्ट्रेट और कलेक्टर थे। विद्रोह का समाचार सुनकर ह्रूम ने अपने विश्वसनीय तथा राजनिष्ठ भारतीय सैनिकों की टुकड़ी बनाई। कुछ क्रांतिकारी सैनिक एक मंदिर में ठहरे हुए थे। ह्रूम जैसे ही मंदिर पर धावा बोलने पहुंचे कि उनके पीछे सहायता के लिए आने वाले, जिन राजनिष्ठों को वे अपना सहायक समझ रहे थे, वे सब मंदिर के पास पहुंचते ही मंदिर को घेर कर रक्षा के लिए खड़े हो गए। उन्होंने मंदिर में बैठे क्रांतिकारियों की जय-जयकार शुरू कर दी। नगर व गांवों के लोगों को उन क्रांतिकारियों के लिए भोजन सामग्री पहुंचाता देखकर ह्रूम को पसीना आ गया। जिन भारतीय सैनिकों को ह्रूम अपने साथ ले गये थे, उनमें से केवल एक ही मंदिर पर धावा बोलने में शामिल हुआ तथा वह भी क्रांतिकारियों की गोली से मारा गया। यह दृश्य देखते ही ह्रूम ने आदेश भंग करने वाले भारतीय राजनिष्ठ सैनिकों को लताड़ना भूलकर भाग कर जान बचाने में ही भलाई समझी। वे अपनी छावनी के तंबू में घुस जाने तक भागते रहे।

भारतीय सेना के क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश छावनी पर हमला किया। "मारो फिरंगी को" की गूंज सुनते ही ह्रूम तथा अन्य गोरे अफसर थरथर कांपने लगे। ह्रूम ने साड़ी पहनी, फिर उस पर बुरका ओढा, महिला के वेश में वह जान बचाकर भागने में सफल हुआ।

अपने प्राणों पर बन आई इस घटना का जो डर ह्रूम के मन में बैठा, वह जीवन भर उनको बेचैन किये रहा। इसका चिरंतन परिणाम उनकी राजनीति पर भी पड़ा। सन 1857 जैसी सशस्त्र क्रांति का संकट अंग्रेजी सत्ता को फिर से न झेलना पड़े, इसके लिए क्या उपाय किए जाएं यह चिन्ता उन्हें हमेशा सताती रही। ("1857 का स्वातंत्र्य समर" से)

विनायक दामोदर सावरकर जी ने ह्रूम द्वारा आगे चलकर इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि को उजागर करते हुए लिखा-

वासुदेव बलवन्त फड़के को 1878-79 के सशस्त्र विद्रोह से भयाक्रांत हुए अंग्रेजी सत्ताधारियों तथा कूटनीतिज्ञों ने गहन विचार-विमर्श के दौरान एक संगठन बनाने का निर्णय लिया। भारतीयों की क्रांतिकारी प्रवृत्ति को कुंठित करने के उद्देश्य से आगे चलकर 1883 में सरकारी सेवा से मुक्त होते ही ए.ओ. ह्रूम ने इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना का ताना-बाना बुना।

1885 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के बम्बई में हुए पहले अधिवेशन में ह्रूम साहब ने बार-बार भारत साम्राज्ञी महारानी विक्टोरिया की जय-जयकार के नारे लगवाये।

ह्रूम ने एक बार स्पष्ट कहा था- ब्रिटिश सत्ता को हिन्दुस्थान में सुरक्षित रखने के लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस की बड़ी आवश्यकता है।


काँग्रेस के तीसरे अधिवेशन में मद्रास के एक प्रतिनिधि ने जब शस्त्रबन्दी अधिनियम रद्द कर भारतीयों को भी शस्त्र रखने की अनुमति दिये जाने की मांग की तो ह्रूम बड़े रूखे स्वर में बोले- सन 1857 के भीषण संकट के अनुभव को देखते हुए भारतीय लोगों को पुन: शस्त्र देने की छूट घातक होगी।

ह्रूम ने भारत से विदा लेते समय दिए गये अपने सन्देश में भी उस ब्रिटिश जाति को सभ्य और शिष्ट बताया जिसने भारत में शासन के दौरान अपनी क्रूरता व अत्याचारों से मानवता को तार-तार कर डाला था। संसार के अनेक देशों को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ने वाले ब्रिटेन को वे अंत तक स्वतंत्रता का केन्द्र बताने में गर्व करते थे। काँग्रेस उसी ह्रूम की रोपी गई पौध है, क्या इस देश के काँग्रेसी इसी पर गर्व करते हैं कि एक भारतविद्वेषी और राष्ट्रभक्तों के हत्यारे ने उनकी पार्टी की नींव रखी थी?

मंगलवार, 2 मार्च 2010


मनोरंजन कलश का हास्य -व्यंग्य विशेषांक छापकर तेयार है ,जल्द है आपके हाथो में होगा । विनोद बब्बर का मुर्ख आलेख ,डा सुशिल गुरु की नेता की कहानी ,केशव जांगिड की इति श्री व्यंग्य कथा , प्रभा माथुर की कहानी आधी कृति ,लन्दन से शन्नो अग्रवाल की कविता ,नेपाल से उदय पन्त की क्षणिकाए ,कृष्णा सोबती की कृति 'मित्रो मरजानी ' की समालोचना ,शिवानी की कविता ,व्यंग्य श्री पुरूस्कार समारोह की झलकिया ,राजकमल प्रकाशन की साठवी जयंती ,नामवर सिंह की चार पुस्तको का विमोचन ,मुर्ख समेल्लन की खबर और भी बहुत कुछ ,लाखो पाठको की साहित्यिक पत्रिका जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे ,आज ही प्रति मंगवाए ,सदस्यता ले ....वार्षिक १०० /- मात्र
कॉल करे .. ०९२१०५००१६३

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

हिमांशु डबराल की एक कविता होली के अवसर पर ....

रंग
रंग बदल जाते है धुप में, सुना था
फीके पड़ जाते है, सुना था
पर उड़ जायेंगे ये पता न था!
हाँ ये रंग उड़ गए है शायद...
जिंदगी के रंग इंसानियत के संग,
उड़ गए है शायद...
अब रंगीन कहे जाने वाली जिंदगी, हमे बेरंग सी लगती है,
शक्कर भी हमे अब फीकी सी लगती है...
कहा है वो रंग???
जो रहेते थे रिश्तो के संग
बाप की डाट और माँ के दुलार के रंग,
खेलने के घाव और बचपन की नाव के रंग,
पडोसी की चाय के, बुजुर्गो के साये के रंग,
हाथों में वो हाथ, दोस्तों के साथ के वो रंग,
उड़ गए है शायद...
तितलियों को पकड़ते नन्हे हाथो के रंग,
बच्चो के खेल और बडो के मेल के वो रंग
चटपटी सी चाट, घर की पुरानी खाट के रंग,
मानिंद चलती हवाओ में खुशबु के रंग,
उड़ गए है शायद...
कोशिश करो की ये रंग उड़ने न पाए
क्योकि ये रंग उड़ गए तों...
फिर न रहेगी रंगीन मुस्कान, रंगीन यौवन, रंगीन जिंदगी॥
छोटी-छोटी खुशियों की वो ताल,
छीन न जाये उड़ न जाए, उड़ न जाये...
रंग भरो जिंदगी में जिंदगी के,संग उडो जिंदगी के रंगों में॥
हसों और मुस्कुराओ और गाओरंगी समां, रंगी जहा बनाओ...(केशव जांगिड की तरफ से मंगल कामनाये )

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

क्षणिकाए (उदय पन्त काठमांडू (,नेपाल_)

(१)
बॉलीवुड
में कद्र है

एक्सपेरिएं लोगों की

सबसे सुंदर अभिनेत्रियाँ

विवाह करती हैं

विवाहित व्यक्तियों से!

()

बदले ज़माने के बदले रंग

सभी बदलाव के संग

खेल प्रेमियों के लिए आई पी एल

प्रेमियों के लिए आई पिल!

()

नेताओं के घोषणा पत्र में

अब उनकी संपत्ति की भी चर्चा थी

मात्र मानद वेतन पाने पर भी

लक्ष्मीजी ज़म कर बरसीं थीं

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

हास्य व्यंग्य -2010


'मच्छरों की दीवानगी' (शन्नो श्रीवास्तव )


मच्छरों की इतनी शरारत सही

है इनमें रत्ती भर भी शराफत नहीं

हैवह हमें सताने की जुर्रत करते रहे

हैं और हम मजबूर होकर सहते रहे हैं

तहजीब न सीखी है इन्होने अब तलककाट लेते

हैं झपकती

है जैसे पलक भगाने की मैं तरकीबें करती रही हूँ

इनकी आहट से बराबर डरती रही हूँ

मुझे हर दिन जख्मों से घायल किया

हैअपनी तदबीरों से मुझको कायल किया हैना खौफ

है उनको उस खुदा काक्या

करूँ मैं इनकी हर अदा का इन जल्लादो ने ढाये

हैं इतने कहर याद आते रहेंगे

वह मुझे हर पहरशर्म का पानी आँखों में मर चुका

हैमुझसे बदला न जाने किस जनम का है

जिक्र जब छिड़ता है

इनकी फितरत कासोचती हूँ

एक अजूबा

हैं इस कुदरत काखून पीकर भी जी भर,

ये रहते

हैं प्यासे किस मिट्टी से यह जल्लाद गये

हैं तराशेगुनगुनाते, भुनभुनाते चुभोते

हैं नश्तरइनके कत्ले-आम का गवाह होता

है बिस्तरइन नादानों को कब

इतना इल्म होगा आखिर

में इनको ही अंजाम होगा भुगतनाकिसी

दिन भी न करते हैं

कोई इनायत बख्श दें

हमें जुल्मों से करें कुछ रियायत दीवानगी

बढ़ जाती है हद से ही ज्यादायह सुबह तक न

कहते हैं अलविदा।


हास्य व्यंग्य उत्सव

उत्तर और बिहार में पंगा (शन्नो श्रीवास्तव )

बस जब आई भरी खचाखच कुछ लोग चढ़े कुछ गये
उतर धक्के से एक गिरा टोकराजिसके सारे लड्डू गये
बिखररुके एक सज्जन फिर झट से जब गिरा टोकरा
नीचेतब देखा कोई वहाँ खड़ा था चिपका उनके पीछे
खड़े थे वह धोती चप्पल में कांधे पर संदूक
उठायेतेल से चिपके बालों में गाँठ लगी चुटिया
लहरायेपान भरा था मुँह में उनके और गले में
पड़ा अंगौछापुचुर-पुचुर थूका जमीन परफिर आस्तीन
से मुँह पोंछाबोले हमको भी जल्दी है बाबू बस है
अब चलने ही वालीना ऐसे आँख दिखाओ हमको है
साथ में हमरी घरवाली बाबू जी बोले ' हट दूर
खड़ा होवरना दूँगा ऐसा झापड़ आयेगी नानी याद तुझे
और गिरेगा दूर सड़क परधक्का देकर हैं तूने मेरे सारे
लड्डू गिरा दिये क्या छोड़ है आया आँखें घर पर जो कोई
दिखा नहीं दायें-बायें 'चुटिया वाले बोले ' देखोअब हो जायेगी
मारामारीहम कुश्ती में भी माहिर हैं और नाम है
हमरा वनवारी तुम क्या अपनी तमीज घर पर उतारि
रखि आये हो और सर पर टोपा पहिनजेंटलमैंन बनि आये हो
हैं आप उत्तरी हम हूँ बिहारीआओ हो जायें दो-दो हाथ
अब आपने हमको ललकारा है बढ़ गयी है अब इतनी
बात 'बाबू बोले ' तेरे जैसा मूढ़ बुद्धि का ना कोई अब
तक देखा 'चुटिया वाले बोले ' ठीक है देखोतीर है
जब ऐसा फेंका 'हो गया सीन लड़ाई का तब
वहाँ पर अच्छा ख़ासाजुट गयी भीड़ तमाम और
बन गया एक तमाशातू-तू , मैं-मैं हुई बहुत पर
निकल ना पाया कोई हल तब कंडक्टर ड्राइवर से
बोला'अरे भइया छोड़ इन्हें जल्दी चल'।

(मोलिक लेखन हेतु शुभ कामनाये , केशव जांगिड ,उपसंपादक ,मनोरनजन कलश)

हास्य - व्यंग्य उत्सव -२०१० (जमाल अहद का व्यंग्य )


व्यंग्य - दादी टी शॉप (जमाल 'अहद ' ,साऊदीअरब से )



जाड़े कि कपकपाती अँधेरी रात में हॉस्पिटल से नाईट ड्यूटी कर के निकलने को ही था कि जी चाहा एक कप गरमा गरम चाय पी जाए. घर में इस समय चाय तो मिलने से रही . श्रीमती जी ने यह कह कर इनकार कर देना था कि ,” बार बार परेशान ना करो . बच्चों को सुबह स्कूल जाना है . जल्दी सो जाओ . यह मूई हॉस्पिटल की ड्यूटी भी अजीब है , ना दिन को चैन ना रात को आराम . इतनी रात को चाय पीने से नींद भी नहीं आयेगी. वगैरह वगैरह.” इनका कहना भी ठीक ही है . पिताजी डॉक्टर थे लेकिन हमेशा यही सीख देते थे कि बेटा डॉक्टर मत बनना , जिंदगी अजीर हो जाएगी . लेकिन खुद हर समय मरीजों की मदद के लिए तय्यार रहते थे . कभी आधी रात को दरवाज़े की घंटी बजती तो मैं खीझ उठता था की दरवाज़ा नहीं खोलूँगा . यह कोई समय है किसी के घर आने का ? लेकिन पिताजी फ़ौरन दरवाज़ा खोल कर मुस्कुराते हुए पूछते कहिये क्या बात है ? लोगों का तो कहना था की डॉक्टर साहब की बात से ही आधी बीमारी भाग जाती है . अब यह सब बातें अपनी श्रीमतीजी को कैसे समझाऊँ , कैसे बताऊँ की मरीज़ के चेहरे पर मुस्कराहट देख कर कितनी राहत होती है , इसलिए सोंचा की अच्छा है कि चाय बाहर ही पी जाए ताकि इनकी बक बक तो ना सुनने को मिले .हॉस्पिटल के बगल ही में एक “दादी टी शॉप ” थी . एक बूढ़ी औरत इस दुकान को चलाती थी . हम सब उसे दादी कह कर बुलाते थे और वह हमें ” नूनू ” . बंगला में छोटे बच्चों को नूनू कहकर बुलाते हैं . दादी हमें उस समय से जानती है जब 1st इयर में एडमिशन के बाद हमारी रैगिंग चल रही थी दादी की दुकान के सामने . हमारे सीनीयर ने आर्डर किया था ” एक घूँट में पूरी चाय पी जाओ ”. कोशिश की तो जीभ जल गयी , दर्द से बिलबिला उठा. तब दादी ने आकर जान बचाई . सीनियर्स को फटकार लगाई ,” क्या अपने दिन भूल गए जब भीगी बिल्ली की तरह अपने सीनियर्स से छुपते फिरते थे और मैं तुम्हें अपने दुकान में छुपा देती थी . यह नूनू बड़ा भोला है . इस पर इतना जुल्म ना करो .” दादी की दुकान के सामने जा कर मैंने अपने पुराने अंदाज़ में आवाज़ लगाई ” की दादी , घुमाचेन ना की ( दादी क्या सो रही हो )?” भीतर से एक कमज़ोर सी आवाज़ आयी ” नूनू तू कैसा है रे ”. दादी थोड़ी बीमार सी लगी . मन विचलित हो उठा . दुकान के अन्दर झांक कर देखा तो स्तब्ध रह गया . एक फूस की चटाई पर दादी लेटी थी . उसके शरीर पर बस एक नाम मात्र को चादर थी ठण्ड से बचने के लिए . बुरी तरह कपकपा रही थी बेचारी . उसका माथा छु कर देखा तो बहुत तेज़ बुखार था . फिर भी बोली ,” नूनू अदरक वाली चाय पीएगा ?” मेरा दिल भर आया . खुद इतनी तकलीफ में थी लेकिन फिर भी मेरा इतना ख्याल था उसको . मैंने बगल में पड़ी एक जर्जर सी रजाई उसके ऊपर डाली ताकि कुछ तो ठंडक से दादी को राहत मिले . फिर दादी के पोते से जो की दादी की दुकान में ही रहता था अपनी माँ के साथ और दादी का हाथ बटाता था, यह कहकर हॉस्पिटल की तरफ भागा कि तू चाय के लिए पानी गरम कर , मैं अभी आया . वापस आकर अदरक वाली चाय के साथ बुखार कि गोली दादी को खिलाई . थोड़ी देर के बाद उसको दूध और पाव जो कि दादी का मनपसंद खाना था खिलाया . जब दादी की तबीयत थोड़ी संभली तो चहकने लगी . पूरे परिवार का हाल चाल पूछ लिया . कहने लगी ,” सुना है की तुझे दिल का दौरा पड़ा था और ऑपरेशन भी हुवा. अब कैसा है तू ? दवाई वगैरह टाइम पर लेता है की नहीं ? मैं तो शुरू से कहती थी की इतनी सिगरेट मत पीया कर लेकिन तू कहाँ मानने वाला . देख लिया नतीजा ?” दादी की सारी बातें सर झुका कर सुनता रहा . मेरी आँखों से आंसू बह निकले .शायद मेरी अपनी माँ ने इतना अपनापन नहीं दिखाया था मेरे साथ . जबसे मैंने दादी को देखा ऐसे ही देखा , प्यार की मूर्ती . जब भी कॉलेज जाता एक बार उस देवी के दर्शन जरूर करता . परीक्षा के दिनों में वह मुझे अपने हाथ से दही खिलाना कभी नहीं भूली . मैं अपनी हर परेशानी हर तकलीफ दादी को सुनाता था . पता नहीं क्यों सारी बातें बता कर दिल को बड़ा चैन मिलता था . मेडिकल की डिग्री लेने के बाद ट्रेनिंग और उसके बाद फिर स्पेशलिस्ट की पढ़ाई और ट्रेनिंग . भाग्यवश अपने ही कॉलेज के हॉस्पिटल में एक बालरोग विशेषग्य की जगह खाली थी , सो मैंने भी अर्जी दे दी और मेरा चयन हो गया . आज पचीस साल से यहाँ पर कार्यरत हूँ. हर काम के लिए , हर परीक्षा या इंटरवीऊ के लिए दादी का आशीर्वाद लेना नहीं भूला . दादी के पति का देहांत हमारे हॉस्पिटल में ही हुवा था . टी .बी . की बीमारी थी – आखरी हालत में पहुंचा था बेचारा हॉस्पिटल . डाक्टरों की अन्थक प्रयास के बाद भी वह बच नहीं पाया . दादी का एक १० -१२ साल का बेटा था उसके साथ . हॉस्पिटल के लोगों को तरस आया और उन लोगों ने चंदा जुटा कर उसके पति के क्रिया करम का इन्तेजाम किया और हॉस्पिटल के बगल ही में एक झोपडी बनवा दी दादी के रहने के लिए . जीविका चलाने के लिए दादी ने चाय की दुकान शुरू कर दी जो की चल निकली . बेटा बड़ा हुवा तो दादी की मुश्किलें भी बढीं . उसको जूए और शराब की लत लग चुकी थी . बात बात पर अपनी माँ से झगडा करता और पैसे ना मिलने पर धमकियाँ देता . फिर किसी के कहने पर की इसकी शादी कर दो सुधर जायेगा , दादी ने बेटे की शादी कर दी . साल गुजरा नहीं कि पोता भी आ गया . लेकिन बेटे कि आदत में सुधार नहीं हुवा . एक दिन मैं इमरजेंसी रूम में बैठा था कि दादी बेटे को लेकर पहुंची . वोह पेट के दर्द से कराह रहा था . जांच करने पर पता चला कि उसका लीवर पूरी तरह ख़राब हो चुका था शराब कि वजह से . चंद दिनों के बाद बेटा भी चल बसा . अब दादी के लिए दुनिया में सिर्फ बहु और पोते ही बचे थे . लेकिन फिर भी उसने हार नहीं मानी और जिंदगी से लड़ती रही . जब दादी का बुखार उतर गया तो दुसरे दिन आने का वादा कर के मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा . साथ ही साथ यह भी सोंचता जा रहा था दादी के बारे में . यह बंगाल की मैं बिहार का . उसकी भाषा अलग , मेरी भाषा अलग . लेकिन फिर भी कितना अपनापन लगता है जब भी मैं उस देवी को देखता हूँ . उसने अपनी भाषा मुझे सिखाई और मैंने उसे अपनी . उसने बंगाल की मिष्टी हमें खिलाई तो हमने उसे बिहार की जलेबी . आज जब के मैं ५० वर्ष का हो गया हूँ , मेरा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और बेटी मेडिकल में प्रवेश के लिए जीतोड़ परिश्रम कर रही है , दादी आज भी मुझे नूनू कह कर बुलाती है . उसके मुख से नूनू सुनकर मैं गदगद हो उठता हूँ . काश हमारे देश की सारी जनता ऐसी ही होती. काश हमारे पूरे भारतवर्ष में भाषा , धर्म और जाती के नाम पर भेद भाव नहीं किया जाता तो आज हमारी धरती स्वर्ग होती . जननी जन्म भूमिश्च . स्वर्गढ़ापी गरीयसी (बालरोग विशेषग्य, सफवा जेनेरल हॉस्पिटल, सऊदी अरब)
( इस मोलिक रचना के लिए बधाई ....केशव जांगिड , उपसंपादक , मनोरंजन कलश )

हास्य -व्यंग्य उत्सव -२०१० / विनायक शर्मा का व्यंग्य


इधर लक्ष्मण की धोती...........और उधर दर्शकों के ठहाके ।


बहुत पुरानी बात है जब हम कानपुर के स्वरुप नगर (मोतीझील के सामने ) रहा करते थे व मैं बिरला मन्दिर के करीब "टैगोर विद्या मन्दिर " में दूसरी या तीसरी कक्षा में पढता था । विद्यालय के वार्षिक व पारितोषिक वितरण समारोह के उत्सव का दिन था । सीता हरण के नाटक का प्रदर्शन हो रहा था । इस नाटक में रत्ना नाम की पांचवीं कक्षा की एक छात्रा ( जिसका कि बाद में विद्यालय कि एक पिकनिक से वापसी के समय "पनकी " के पास रेलवे के फाटक पर ट्रैक्टर पलटने से मृत्यु हो गई थी ) भगवान श्रीराम का रोल कर रही थी व मैं (विनायक शर्मा) लक्ष्मण का रूप धारण किए हुए राम के साथ -साथ चल रहा था । तो दृश्य था - सीता हरण के बाद राम का विलाप । विलाप करते हुए राम कहते हैं " हे खग मृग, हे मधुकर श्रेणी ,तुम देखि सीता मृग-नैनी" दृश्य बहुत ही करुणा मय था, राम जी का "हे सीते-हे सीते" कह कर विलाप करना व लक्ष्मण का सीता हरण के लिए स्यवम को दोषी मानते हुए "सीता-माता" पुकारते हुए क्रंदन करना । दो नन्हें-नन्हें कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट कला से सभी दर्शकों को न केवल मत्रमुग्ध ही कर रखा था अपितु सभी दर्शकों के नयन भी सजल थे । जंगल -जंगल विचरण करते हुए एक स्थान पर राम और लक्ष्मण अपना एक घुटना धरती पर टिका कर विलाप करते हैं फिर पुनः उठ कर चल देते हैं । इस दृश्य में उठते हुए मेरी यानि लक्ष्मणजी की धोती पावं में फँस कर खुल जाती है । वर्तमान समय की भांति हमारे बचपन में छोटे बच्चे जांगिया आदि नहीं पहना करते थे । ( विशेष: शायद इस घटना या दुर्घटना के पश्चात ही छोटे बच्चों को जांगिया या अंगवस्त्र पहनाने का प्रचलन आरम्भ हुआ हो ।)अब आप सभी पाठक गण भली-भांति समझ सकते हैं कि उस समय वहां क्या दृश्य चल रहा होगा ? इसी बीच लक्ष्मण का सीता मैया को भूलकर, धोती पकढ़ कर "परदा गिराओ-परदा गिराओ" कि चिल्लाहट सुन कर भगवान राम भी सीते की पुकार छोड़ , परदा खींचने को दौर पड़े । हम तो उस समय बहुत ही छोटे थे । एक ओर से धोती खुलने से आई विपदा फिर उपर से "शेम -शेम" का भी भय, इसलिए दर्शकों कि प्रतिक्रिया तो अपनी आँखों से न तो हम देख पाए और न ही समझ पाए । बालसुलभ बुद्धी को इतना तो अवश्य ही समझ में आ गया था कि समाज में बहुत ही असमानता व्याप्त है । जब राम जी की सीता गई तो सभी के नयनों में नीर था परन्तु जब लक्षमण जी की धोती गई तो सभी ठहाके लगाने लगे । इस वृतांत को घटित हुए बहुत वर्ष बीत गए परन्तु देर तक आती रही उन ठहाकों की आवाज आज भी कानों में गूंजती सी प्रतीत होती है । हँसते -हँसते तो बहुत से लोगों की आँखों से पानी निकल आता है , परन्तु तनिक सोचिये जब हजार-पन्द्रह सौ दर्शकों की ऑंखें सजल हों और अचानक ही वे ठहाके लगाने लग जायें, तो करुणा से सराबोर ऐसा हास्य दृश्य देख कर आप भी कह उठेंगे "वाह क्या सीन है । "आज इतने वर्षों बाद भी जब कभी मैं किसी विद्यालय के वार्षिक उत्सव में जाता हूँ , तो नजरें अपने सरीखे उस भोले से निरापद लक्ष्मण को अवश्य ही तलाशती हैं जो कि मेरे बचपन के साथ ही कहीं खो गया है ।


(इस मोलिक लेखन हेतु शुभ कामनाये ...केशव जांगिड ,उपसंपादक , मनोरंजन कलश )

रविवार, 24 जनवरी 2010

हास्य -व्यंग्य उत्सव -2010

मनोरंजन कलश और बाल साहित्य क्लब के इस हास्य -व्यंग्य उत्सव में आप सबका अभिनन्दन है । हिंदी लखन में आज सक्रीय भागीदारी की कमी है , अत : उसी ग्रहण को हिंदी से हटाने में हम कोशिश मग्न है , आप का साथ इस उत्सव में जरुरी है ,अपनी स्तरीय हास्य - व्यंग्य कहानी ,कविताए ,आलेख जल्दी पोस्ट करे .....
मनोरंजन कलश के मार्च विशेषांक में आप स्थान पाएगे .आज से और कल तक अपनी रचन्ये पोस्ट करे
पता : मनोरंजन कलश @ जीमेल .कॉम या केशव जांगिड @जीमेल.कॉम ....
याद रहे हिंदी आज सक्रिय भागीदारी मांग रही है , कवल गाल बजाने वाले हिंदी का भला नहीं करेगे ।
साधुवाद ....


केशव जांगिड (कवि और लेखक )

हास्य -व्यंग्य उत्सव -2010


मनोरंजन कलश पत्रिका मार्च माह में अपना हास्य - व्यंग्य विशेषांक प्रकाशित करने जा रहा है । इसी क्रम में फेसबुक पर २ फरवरी से २० फरवरी -२०१० तक हम हास्य महोत्सव मानाने जा रहे है । जीवन की भाग दौड से परे एक मोलिक प्रयास हमारे और आपके द्वारा , हमारे इस महोत्सव में अपनी हास्य कथाए , कविताए , व्यंग्य आलेख , छुटपुट रचनाये पोस्ट करे , फेसबुक के साथ साथ मनोरंजन कलश में भी आप स्थान पाएगे । अपनी कर्मठता दिखाए ,हसी हम सबके लिए जरुरी है , खूब उत्साह के साथ भाग ले । अपनी रचनाये हिंदी में फेसबुक पर पोस्ट करे या ...केशव जांगिड @जीमेल .कॉम या मनोरंजन कलश @जीमेल .कॉम पर पोस्ट करते रहे ............

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010


मनोरंजन कलश पत्रिका मार्च माह में अपना हास्य - व्यंग्य विशेषांक प्रकाशित करने जा रहा है । इसी क्रम में फेसबुक पर २ फरवरी से २० फरवरी -२०१० तक हम हास्य महोत्सव मानाने जा रहे है । जीवन की भाग दौड से परे एक मोलिक प्रयास हमारे और आपके द्वारा , हमारे इस महोत्सव में अपनी हास्य कथाए , कविताए , व्यंग्य आलेख , छुटपुट रचनाये पोस्ट करे , फेसबुक के साथ साथ मनोरंजन कलश में भी आप स्थान पाएगे । अपनी कर्मठता दिखाए ,हसी हम सबके लिए जरुरी है , खूब उत्साह के साथ भाग ले । अपनी रचनाये हिंदी में फेसबुक पर पोस्ट करे या ...केशव जांगिड @जीमेल .कॉम या मनोरंजन कलश @जीमेल .कॉम पर पोस्ट करते रहे ............

रविवार, 17 जनवरी 2010

रेखा राजवंशी की पुस्तक , बुमरेंग , का लोकार्पण

गत १५ जनवरी को रेखा राजवंशी के कविता संग्रह बूम्रंग (किताबघर ) का लोकार्पण हिंदी भवन में किया गया ।
इस अवसर पर श्री अशोक चक्रधर , कन्हेयालाल नंदन , आनामिका ,अलका सिन्हा और गण मान्य लोग शामिल थे । इस पुस्तक में ऑस्ट्रेलिया के ११ भारतीय अप्रवासी कवियों की कविताए है ..........कवि ओए लेखक श्री केशव जांगिड ने ली कुछ तस्वीरे ....................

श्री चक्रधर संग रेखा राजवंशी जी ............................









श्री कन्हेयालाल नंदन जी (लेखक और पत्रकार ).....................















अनामिका जी भाषण के दोरान ...............................







मंचासीन अतिथि .................................























आयोजन में रखी गई मनोरंजन कलश पत्रिका ............................

























संचालिका अलका सिन्हा ..........................................







पुस्तक बूम्रंग .......................................




















विदेशी अतिथि .................................................
















































युवा दिवस कवि सम्मलेन (हिंदी भवन )

अयोध्या के कवि ज्ञानेश दिर्वेदी ........................









युवा मंच पर कवि हर्मेंद्र पाल का कविता ...................







कुमार केसरी की कविता .............................................








बिहार से पधारे उदय कुमार भारती की कविता ....................






मंचासीन अतिथि और कविगण ..................................








दिल्ली के कवि चिराग जैन और मुख्य अतिथि स्वामी प्रज्ञानंद जी ......







गजल कार और गीत कार श्री विकल साकेती जी का गीत ..........








श्री पवन श्रीवास्तव जी की कविता ...................................












































































































सोमवार, 11 जनवरी 2010

नव चेतना उत्सव - (जमाल अहद )

यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि हमारे देश के पिछड़ेपन के मूल कारण हैं हमारे नेता. आज़ादी के बाद से आजतक कैसे कैसे नेता आये और हमलोगों पर अपनी मनमानी करके चले गए. शायद पांच प्रतिशत ही उनमे बुद्धिजीवी या पढ़ेलिखे थे , बाकी सब फूहड़ गंवार . और अफ़सोस कि बात यह है कि हमने ही उनको चुनकर अपने ऊपर राज करने दिया. इस गलती के लिए हमसब जिम्मेदार हैं. हमारे देश में एक से बढ़कर एक पढ़े लिखे लोग हैं लेकिन हमने जाहिल गंवार लोगों को ही चुना. इसमें कुछ लोगों का स्वार्थ ज़रूर होगा लेकिन अधिकतर जनता भेडचाल में एक के पीछे एक जाकर वोट डाल कर ऐसे निष्क्रिय और नपुंसक लोगों को चुनते गए जो सिर्फ अपना पेट भरना जानते हैं. उनको देश कि क्या चिंता. अरे अगर माकूल पैसा मिले तो वोह अपने मातृभूमि का भी सौदा करने से नहीं हिचकिचाएंगे. शर्म आती है ऐसे लोगों को अपना नेता अपना लीडर कहते हूवे. १.३ बिलियन लोगों में क्या येही लोग मिले जो हमारे देश को घिसट घिसट कर और दूसरों के रहम करम पर रख कर चलाने में सक्षम थे?
अब बहुत हुवा. पानी सर से ऊंचा हो चूका है और अगर हम अब भी नहीं जागे तो हमारा डूबना निश्चित है. और इसके लिए कोई दूसरा नहीं, कोई विदेशी ताकत नहीं बल्कि हम खुद जिम्मेदार हैं. अब भी समय है कि हम सही लोगों को चुने जो जनता कि सही प्रतिनिधित्व करें,उनकी परेशानियों को समझें और जनहित में कार्य करें ताकि हमारा देश और विकसित देशों कि तरह आगे आगे रहे. हमारे देश कि सभ्यता और संस्कृति को दूसरों ने अपना कर फायदा कर लिया और बहुत कामयाब होगये. अब समय आगया है कि हम अपनी प्रतिभाओं को समझें, उनका सही अवलोकन करें और ऐसे नेताओं को चुने जो हमारे देश को प्रगति कि राह पर ले जाने के लिए मार्ग प्रशस्त करें.
जरूरत है एक ऐसी पद्धति, एक ऐसी नियमावली कि जिसके तहत हमारे नेताओं का चयन हो और उनमें से एक भी ऐसा न हो जो हमारी अपेक्षा के अनुरूप न हो. क्योंकि एक सड़ी मछली सारे तालाब को प्रदूषित कर देती है.
इस बारे में चंद सुझाव यह हैं:(१) नेताओं के चयन के लिए एक न्यूनतम और अधिकतम उम्र कि सीमा निर्धारित होनी चाहिए. (२) इनकी कम से कम पढ़ाई बी.ए या बी.एस.सी तक कि होनी चाहिए.(३) इनमें ३३% अनुभवी और बड़ी उम्र के लोगों के लिए, ३३% युवाओं के लिए और ३३% महिलाओं के लिए सीटें होनी चाहिए. बाकी१% उन अनुभवी लोगों के लिए होना चाहिए जो उम्र की अधिकतम सीमा पार कर चुके हों लेकिन उनका अनुभव हमारे लिए आवश्यक हो.(४) सभी वर्ग और सभी विभाग के लोगों का इसमें समावेश होना चाहिए जैसे डाक्टर,इंजीनिअर ,शिक्षक,उद्योगपति, नामी गिरामी खिलाडी, अवकाशप्राप्त आईएएस और आईपीएस, हाईकोर्ट के जज इत्यादि इत्यादि.(५) हर विभाग के मंत्री को उस विभाग की पूरी जानकारी होनी चाहिए. जैसे खेल मंत्री एक भूतपूर्व खिलाड़ी हो, स्वास्थमंत्री कोई वरिष्ट डाक्टर हो, उद्योगमंत्री एक इंजीनीयर हो, शिक्षामंत्री कोई अवकाशप्राप्त शिक्षक हो. आजकल अंगूठाछाप लोग बड़ी बड़ी मंत्रालयों के सर्वेसर्वा बन जाते हैं और काम के नाम पर एक धेला भी नहीं आता है. यहाँ बैठे तो काम ख़राब करते ही हैं, विदेशों में जाकर भी अपनी मूर्खता का परिचय देते हैं जिससे हमारी जग हसाई होती है. (६) हर मंत्री का कार्यकाल ५ साल का हो और चुने जाने पर उनको अपनी राज्य के बजाये दुसरे राज्य में भेजा जाए. (७) किसी भी मंत्री को अधिक से अधिक ३ बार चुनाव में खड़े होने की अनुमति होनी चाहिए.(८) चुनाव के लिए आईएएस और आईपीएस जैसी एक परीक्षा होनी चाहिए जिसका क्रमांक ५०% हो और बाकी के ५०% जनता के वोट से आयें. इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने के पश्चात् इनकी मनोवैज्ञानिक जांच होनी चाहिए ताकि यह पता लग सके की क्या यह अपने विभाग का भार उठाने में सक्षम होंगे? जरूरत पड़ने पर लाई डिटेक्टर टेस्ट भी होना चाहिए.(९) सारे विभागों और मंत्रियों की साल भर की उपल्भधियाँ और कमियाँ जनता को मालूम होनी चाहिए और कमियों के कारण की समीक्षा होनी चाहिए. कमी के जिम्मेदार लोगों को कारण बताओ नोटिस देना चाहिए और अनुकूल जवाब नहीं मिलने पर उनको उनकी गलती के लिए जिम्मेवार ठहराना चाहिए.
यह एक सपना ही है शायद लेकिन अगर ऐसा हुवा तो हमारा देश भी अमेरिका, जापान और फ्रांस से मुकाबला कर सकेगा। हमारे इतने पढ़े लिखे और टैलेंटेड लोगों को रोजी रोटी के लिए विदेशों में नहीं भटकना पड़ेगा और वोह अपने देश में ही रह कर अपना जीविका पा सकेंगे और देश की उन्नति और प्रगति में हाथ बता सकेंगे।

(इस लेख हेतु शुभ कामनाये- केशव जांगिड )