मंगलवार, 2 मार्च 2010


मनोरंजन कलश का हास्य -व्यंग्य विशेषांक छापकर तेयार है ,जल्द है आपके हाथो में होगा । विनोद बब्बर का मुर्ख आलेख ,डा सुशिल गुरु की नेता की कहानी ,केशव जांगिड की इति श्री व्यंग्य कथा , प्रभा माथुर की कहानी आधी कृति ,लन्दन से शन्नो अग्रवाल की कविता ,नेपाल से उदय पन्त की क्षणिकाए ,कृष्णा सोबती की कृति 'मित्रो मरजानी ' की समालोचना ,शिवानी की कविता ,व्यंग्य श्री पुरूस्कार समारोह की झलकिया ,राजकमल प्रकाशन की साठवी जयंती ,नामवर सिंह की चार पुस्तको का विमोचन ,मुर्ख समेल्लन की खबर और भी बहुत कुछ ,लाखो पाठको की साहित्यिक पत्रिका जो आपको सोचने पर मजबूर कर दे ,आज ही प्रति मंगवाए ,सदस्यता ले ....वार्षिक १०० /- मात्र
कॉल करे .. ०९२१०५००१६३

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

हिमांशु डबराल की एक कविता होली के अवसर पर ....

रंग
रंग बदल जाते है धुप में, सुना था
फीके पड़ जाते है, सुना था
पर उड़ जायेंगे ये पता न था!
हाँ ये रंग उड़ गए है शायद...
जिंदगी के रंग इंसानियत के संग,
उड़ गए है शायद...
अब रंगीन कहे जाने वाली जिंदगी, हमे बेरंग सी लगती है,
शक्कर भी हमे अब फीकी सी लगती है...
कहा है वो रंग???
जो रहेते थे रिश्तो के संग
बाप की डाट और माँ के दुलार के रंग,
खेलने के घाव और बचपन की नाव के रंग,
पडोसी की चाय के, बुजुर्गो के साये के रंग,
हाथों में वो हाथ, दोस्तों के साथ के वो रंग,
उड़ गए है शायद...
तितलियों को पकड़ते नन्हे हाथो के रंग,
बच्चो के खेल और बडो के मेल के वो रंग
चटपटी सी चाट, घर की पुरानी खाट के रंग,
मानिंद चलती हवाओ में खुशबु के रंग,
उड़ गए है शायद...
कोशिश करो की ये रंग उड़ने न पाए
क्योकि ये रंग उड़ गए तों...
फिर न रहेगी रंगीन मुस्कान, रंगीन यौवन, रंगीन जिंदगी॥
छोटी-छोटी खुशियों की वो ताल,
छीन न जाये उड़ न जाए, उड़ न जाये...
रंग भरो जिंदगी में जिंदगी के,संग उडो जिंदगी के रंगों में॥
हसों और मुस्कुराओ और गाओरंगी समां, रंगी जहा बनाओ...(केशव जांगिड की तरफ से मंगल कामनाये )

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

क्षणिकाए (उदय पन्त काठमांडू (,नेपाल_)

(१)
बॉलीवुड
में कद्र है

एक्सपेरिएं लोगों की

सबसे सुंदर अभिनेत्रियाँ

विवाह करती हैं

विवाहित व्यक्तियों से!

()

बदले ज़माने के बदले रंग

सभी बदलाव के संग

खेल प्रेमियों के लिए आई पी एल

प्रेमियों के लिए आई पिल!

()

नेताओं के घोषणा पत्र में

अब उनकी संपत्ति की भी चर्चा थी

मात्र मानद वेतन पाने पर भी

लक्ष्मीजी ज़म कर बरसीं थीं

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

हास्य व्यंग्य -2010


'मच्छरों की दीवानगी' (शन्नो श्रीवास्तव )


मच्छरों की इतनी शरारत सही

है इनमें रत्ती भर भी शराफत नहीं

हैवह हमें सताने की जुर्रत करते रहे

हैं और हम मजबूर होकर सहते रहे हैं

तहजीब न सीखी है इन्होने अब तलककाट लेते

हैं झपकती

है जैसे पलक भगाने की मैं तरकीबें करती रही हूँ

इनकी आहट से बराबर डरती रही हूँ

मुझे हर दिन जख्मों से घायल किया

हैअपनी तदबीरों से मुझको कायल किया हैना खौफ

है उनको उस खुदा काक्या

करूँ मैं इनकी हर अदा का इन जल्लादो ने ढाये

हैं इतने कहर याद आते रहेंगे

वह मुझे हर पहरशर्म का पानी आँखों में मर चुका

हैमुझसे बदला न जाने किस जनम का है

जिक्र जब छिड़ता है

इनकी फितरत कासोचती हूँ

एक अजूबा

हैं इस कुदरत काखून पीकर भी जी भर,

ये रहते

हैं प्यासे किस मिट्टी से यह जल्लाद गये

हैं तराशेगुनगुनाते, भुनभुनाते चुभोते

हैं नश्तरइनके कत्ले-आम का गवाह होता

है बिस्तरइन नादानों को कब

इतना इल्म होगा आखिर

में इनको ही अंजाम होगा भुगतनाकिसी

दिन भी न करते हैं

कोई इनायत बख्श दें

हमें जुल्मों से करें कुछ रियायत दीवानगी

बढ़ जाती है हद से ही ज्यादायह सुबह तक न

कहते हैं अलविदा।


हास्य व्यंग्य उत्सव

उत्तर और बिहार में पंगा (शन्नो श्रीवास्तव )

बस जब आई भरी खचाखच कुछ लोग चढ़े कुछ गये
उतर धक्के से एक गिरा टोकराजिसके सारे लड्डू गये
बिखररुके एक सज्जन फिर झट से जब गिरा टोकरा
नीचेतब देखा कोई वहाँ खड़ा था चिपका उनके पीछे
खड़े थे वह धोती चप्पल में कांधे पर संदूक
उठायेतेल से चिपके बालों में गाँठ लगी चुटिया
लहरायेपान भरा था मुँह में उनके और गले में
पड़ा अंगौछापुचुर-पुचुर थूका जमीन परफिर आस्तीन
से मुँह पोंछाबोले हमको भी जल्दी है बाबू बस है
अब चलने ही वालीना ऐसे आँख दिखाओ हमको है
साथ में हमरी घरवाली बाबू जी बोले ' हट दूर
खड़ा होवरना दूँगा ऐसा झापड़ आयेगी नानी याद तुझे
और गिरेगा दूर सड़क परधक्का देकर हैं तूने मेरे सारे
लड्डू गिरा दिये क्या छोड़ है आया आँखें घर पर जो कोई
दिखा नहीं दायें-बायें 'चुटिया वाले बोले ' देखोअब हो जायेगी
मारामारीहम कुश्ती में भी माहिर हैं और नाम है
हमरा वनवारी तुम क्या अपनी तमीज घर पर उतारि
रखि आये हो और सर पर टोपा पहिनजेंटलमैंन बनि आये हो
हैं आप उत्तरी हम हूँ बिहारीआओ हो जायें दो-दो हाथ
अब आपने हमको ललकारा है बढ़ गयी है अब इतनी
बात 'बाबू बोले ' तेरे जैसा मूढ़ बुद्धि का ना कोई अब
तक देखा 'चुटिया वाले बोले ' ठीक है देखोतीर है
जब ऐसा फेंका 'हो गया सीन लड़ाई का तब
वहाँ पर अच्छा ख़ासाजुट गयी भीड़ तमाम और
बन गया एक तमाशातू-तू , मैं-मैं हुई बहुत पर
निकल ना पाया कोई हल तब कंडक्टर ड्राइवर से
बोला'अरे भइया छोड़ इन्हें जल्दी चल'।

(मोलिक लेखन हेतु शुभ कामनाये , केशव जांगिड ,उपसंपादक ,मनोरनजन कलश)

हास्य - व्यंग्य उत्सव -२०१० (जमाल अहद का व्यंग्य )


व्यंग्य - दादी टी शॉप (जमाल 'अहद ' ,साऊदीअरब से )



जाड़े कि कपकपाती अँधेरी रात में हॉस्पिटल से नाईट ड्यूटी कर के निकलने को ही था कि जी चाहा एक कप गरमा गरम चाय पी जाए. घर में इस समय चाय तो मिलने से रही . श्रीमती जी ने यह कह कर इनकार कर देना था कि ,” बार बार परेशान ना करो . बच्चों को सुबह स्कूल जाना है . जल्दी सो जाओ . यह मूई हॉस्पिटल की ड्यूटी भी अजीब है , ना दिन को चैन ना रात को आराम . इतनी रात को चाय पीने से नींद भी नहीं आयेगी. वगैरह वगैरह.” इनका कहना भी ठीक ही है . पिताजी डॉक्टर थे लेकिन हमेशा यही सीख देते थे कि बेटा डॉक्टर मत बनना , जिंदगी अजीर हो जाएगी . लेकिन खुद हर समय मरीजों की मदद के लिए तय्यार रहते थे . कभी आधी रात को दरवाज़े की घंटी बजती तो मैं खीझ उठता था की दरवाज़ा नहीं खोलूँगा . यह कोई समय है किसी के घर आने का ? लेकिन पिताजी फ़ौरन दरवाज़ा खोल कर मुस्कुराते हुए पूछते कहिये क्या बात है ? लोगों का तो कहना था की डॉक्टर साहब की बात से ही आधी बीमारी भाग जाती है . अब यह सब बातें अपनी श्रीमतीजी को कैसे समझाऊँ , कैसे बताऊँ की मरीज़ के चेहरे पर मुस्कराहट देख कर कितनी राहत होती है , इसलिए सोंचा की अच्छा है कि चाय बाहर ही पी जाए ताकि इनकी बक बक तो ना सुनने को मिले .हॉस्पिटल के बगल ही में एक “दादी टी शॉप ” थी . एक बूढ़ी औरत इस दुकान को चलाती थी . हम सब उसे दादी कह कर बुलाते थे और वह हमें ” नूनू ” . बंगला में छोटे बच्चों को नूनू कहकर बुलाते हैं . दादी हमें उस समय से जानती है जब 1st इयर में एडमिशन के बाद हमारी रैगिंग चल रही थी दादी की दुकान के सामने . हमारे सीनीयर ने आर्डर किया था ” एक घूँट में पूरी चाय पी जाओ ”. कोशिश की तो जीभ जल गयी , दर्द से बिलबिला उठा. तब दादी ने आकर जान बचाई . सीनियर्स को फटकार लगाई ,” क्या अपने दिन भूल गए जब भीगी बिल्ली की तरह अपने सीनियर्स से छुपते फिरते थे और मैं तुम्हें अपने दुकान में छुपा देती थी . यह नूनू बड़ा भोला है . इस पर इतना जुल्म ना करो .” दादी की दुकान के सामने जा कर मैंने अपने पुराने अंदाज़ में आवाज़ लगाई ” की दादी , घुमाचेन ना की ( दादी क्या सो रही हो )?” भीतर से एक कमज़ोर सी आवाज़ आयी ” नूनू तू कैसा है रे ”. दादी थोड़ी बीमार सी लगी . मन विचलित हो उठा . दुकान के अन्दर झांक कर देखा तो स्तब्ध रह गया . एक फूस की चटाई पर दादी लेटी थी . उसके शरीर पर बस एक नाम मात्र को चादर थी ठण्ड से बचने के लिए . बुरी तरह कपकपा रही थी बेचारी . उसका माथा छु कर देखा तो बहुत तेज़ बुखार था . फिर भी बोली ,” नूनू अदरक वाली चाय पीएगा ?” मेरा दिल भर आया . खुद इतनी तकलीफ में थी लेकिन फिर भी मेरा इतना ख्याल था उसको . मैंने बगल में पड़ी एक जर्जर सी रजाई उसके ऊपर डाली ताकि कुछ तो ठंडक से दादी को राहत मिले . फिर दादी के पोते से जो की दादी की दुकान में ही रहता था अपनी माँ के साथ और दादी का हाथ बटाता था, यह कहकर हॉस्पिटल की तरफ भागा कि तू चाय के लिए पानी गरम कर , मैं अभी आया . वापस आकर अदरक वाली चाय के साथ बुखार कि गोली दादी को खिलाई . थोड़ी देर के बाद उसको दूध और पाव जो कि दादी का मनपसंद खाना था खिलाया . जब दादी की तबीयत थोड़ी संभली तो चहकने लगी . पूरे परिवार का हाल चाल पूछ लिया . कहने लगी ,” सुना है की तुझे दिल का दौरा पड़ा था और ऑपरेशन भी हुवा. अब कैसा है तू ? दवाई वगैरह टाइम पर लेता है की नहीं ? मैं तो शुरू से कहती थी की इतनी सिगरेट मत पीया कर लेकिन तू कहाँ मानने वाला . देख लिया नतीजा ?” दादी की सारी बातें सर झुका कर सुनता रहा . मेरी आँखों से आंसू बह निकले .शायद मेरी अपनी माँ ने इतना अपनापन नहीं दिखाया था मेरे साथ . जबसे मैंने दादी को देखा ऐसे ही देखा , प्यार की मूर्ती . जब भी कॉलेज जाता एक बार उस देवी के दर्शन जरूर करता . परीक्षा के दिनों में वह मुझे अपने हाथ से दही खिलाना कभी नहीं भूली . मैं अपनी हर परेशानी हर तकलीफ दादी को सुनाता था . पता नहीं क्यों सारी बातें बता कर दिल को बड़ा चैन मिलता था . मेडिकल की डिग्री लेने के बाद ट्रेनिंग और उसके बाद फिर स्पेशलिस्ट की पढ़ाई और ट्रेनिंग . भाग्यवश अपने ही कॉलेज के हॉस्पिटल में एक बालरोग विशेषग्य की जगह खाली थी , सो मैंने भी अर्जी दे दी और मेरा चयन हो गया . आज पचीस साल से यहाँ पर कार्यरत हूँ. हर काम के लिए , हर परीक्षा या इंटरवीऊ के लिए दादी का आशीर्वाद लेना नहीं भूला . दादी के पति का देहांत हमारे हॉस्पिटल में ही हुवा था . टी .बी . की बीमारी थी – आखरी हालत में पहुंचा था बेचारा हॉस्पिटल . डाक्टरों की अन्थक प्रयास के बाद भी वह बच नहीं पाया . दादी का एक १० -१२ साल का बेटा था उसके साथ . हॉस्पिटल के लोगों को तरस आया और उन लोगों ने चंदा जुटा कर उसके पति के क्रिया करम का इन्तेजाम किया और हॉस्पिटल के बगल ही में एक झोपडी बनवा दी दादी के रहने के लिए . जीविका चलाने के लिए दादी ने चाय की दुकान शुरू कर दी जो की चल निकली . बेटा बड़ा हुवा तो दादी की मुश्किलें भी बढीं . उसको जूए और शराब की लत लग चुकी थी . बात बात पर अपनी माँ से झगडा करता और पैसे ना मिलने पर धमकियाँ देता . फिर किसी के कहने पर की इसकी शादी कर दो सुधर जायेगा , दादी ने बेटे की शादी कर दी . साल गुजरा नहीं कि पोता भी आ गया . लेकिन बेटे कि आदत में सुधार नहीं हुवा . एक दिन मैं इमरजेंसी रूम में बैठा था कि दादी बेटे को लेकर पहुंची . वोह पेट के दर्द से कराह रहा था . जांच करने पर पता चला कि उसका लीवर पूरी तरह ख़राब हो चुका था शराब कि वजह से . चंद दिनों के बाद बेटा भी चल बसा . अब दादी के लिए दुनिया में सिर्फ बहु और पोते ही बचे थे . लेकिन फिर भी उसने हार नहीं मानी और जिंदगी से लड़ती रही . जब दादी का बुखार उतर गया तो दुसरे दिन आने का वादा कर के मैं अपने घर की तरफ चल पड़ा . साथ ही साथ यह भी सोंचता जा रहा था दादी के बारे में . यह बंगाल की मैं बिहार का . उसकी भाषा अलग , मेरी भाषा अलग . लेकिन फिर भी कितना अपनापन लगता है जब भी मैं उस देवी को देखता हूँ . उसने अपनी भाषा मुझे सिखाई और मैंने उसे अपनी . उसने बंगाल की मिष्टी हमें खिलाई तो हमने उसे बिहार की जलेबी . आज जब के मैं ५० वर्ष का हो गया हूँ , मेरा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और बेटी मेडिकल में प्रवेश के लिए जीतोड़ परिश्रम कर रही है , दादी आज भी मुझे नूनू कह कर बुलाती है . उसके मुख से नूनू सुनकर मैं गदगद हो उठता हूँ . काश हमारे देश की सारी जनता ऐसी ही होती. काश हमारे पूरे भारतवर्ष में भाषा , धर्म और जाती के नाम पर भेद भाव नहीं किया जाता तो आज हमारी धरती स्वर्ग होती . जननी जन्म भूमिश्च . स्वर्गढ़ापी गरीयसी (बालरोग विशेषग्य, सफवा जेनेरल हॉस्पिटल, सऊदी अरब)
( इस मोलिक रचना के लिए बधाई ....केशव जांगिड , उपसंपादक , मनोरंजन कलश )

हास्य -व्यंग्य उत्सव -२०१० / विनायक शर्मा का व्यंग्य


इधर लक्ष्मण की धोती...........और उधर दर्शकों के ठहाके ।


बहुत पुरानी बात है जब हम कानपुर के स्वरुप नगर (मोतीझील के सामने ) रहा करते थे व मैं बिरला मन्दिर के करीब "टैगोर विद्या मन्दिर " में दूसरी या तीसरी कक्षा में पढता था । विद्यालय के वार्षिक व पारितोषिक वितरण समारोह के उत्सव का दिन था । सीता हरण के नाटक का प्रदर्शन हो रहा था । इस नाटक में रत्ना नाम की पांचवीं कक्षा की एक छात्रा ( जिसका कि बाद में विद्यालय कि एक पिकनिक से वापसी के समय "पनकी " के पास रेलवे के फाटक पर ट्रैक्टर पलटने से मृत्यु हो गई थी ) भगवान श्रीराम का रोल कर रही थी व मैं (विनायक शर्मा) लक्ष्मण का रूप धारण किए हुए राम के साथ -साथ चल रहा था । तो दृश्य था - सीता हरण के बाद राम का विलाप । विलाप करते हुए राम कहते हैं " हे खग मृग, हे मधुकर श्रेणी ,तुम देखि सीता मृग-नैनी" दृश्य बहुत ही करुणा मय था, राम जी का "हे सीते-हे सीते" कह कर विलाप करना व लक्ष्मण का सीता हरण के लिए स्यवम को दोषी मानते हुए "सीता-माता" पुकारते हुए क्रंदन करना । दो नन्हें-नन्हें कलाकारों ने अपनी उत्कृष्ट कला से सभी दर्शकों को न केवल मत्रमुग्ध ही कर रखा था अपितु सभी दर्शकों के नयन भी सजल थे । जंगल -जंगल विचरण करते हुए एक स्थान पर राम और लक्ष्मण अपना एक घुटना धरती पर टिका कर विलाप करते हैं फिर पुनः उठ कर चल देते हैं । इस दृश्य में उठते हुए मेरी यानि लक्ष्मणजी की धोती पावं में फँस कर खुल जाती है । वर्तमान समय की भांति हमारे बचपन में छोटे बच्चे जांगिया आदि नहीं पहना करते थे । ( विशेष: शायद इस घटना या दुर्घटना के पश्चात ही छोटे बच्चों को जांगिया या अंगवस्त्र पहनाने का प्रचलन आरम्भ हुआ हो ।)अब आप सभी पाठक गण भली-भांति समझ सकते हैं कि उस समय वहां क्या दृश्य चल रहा होगा ? इसी बीच लक्ष्मण का सीता मैया को भूलकर, धोती पकढ़ कर "परदा गिराओ-परदा गिराओ" कि चिल्लाहट सुन कर भगवान राम भी सीते की पुकार छोड़ , परदा खींचने को दौर पड़े । हम तो उस समय बहुत ही छोटे थे । एक ओर से धोती खुलने से आई विपदा फिर उपर से "शेम -शेम" का भी भय, इसलिए दर्शकों कि प्रतिक्रिया तो अपनी आँखों से न तो हम देख पाए और न ही समझ पाए । बालसुलभ बुद्धी को इतना तो अवश्य ही समझ में आ गया था कि समाज में बहुत ही असमानता व्याप्त है । जब राम जी की सीता गई तो सभी के नयनों में नीर था परन्तु जब लक्षमण जी की धोती गई तो सभी ठहाके लगाने लगे । इस वृतांत को घटित हुए बहुत वर्ष बीत गए परन्तु देर तक आती रही उन ठहाकों की आवाज आज भी कानों में गूंजती सी प्रतीत होती है । हँसते -हँसते तो बहुत से लोगों की आँखों से पानी निकल आता है , परन्तु तनिक सोचिये जब हजार-पन्द्रह सौ दर्शकों की ऑंखें सजल हों और अचानक ही वे ठहाके लगाने लग जायें, तो करुणा से सराबोर ऐसा हास्य दृश्य देख कर आप भी कह उठेंगे "वाह क्या सीन है । "आज इतने वर्षों बाद भी जब कभी मैं किसी विद्यालय के वार्षिक उत्सव में जाता हूँ , तो नजरें अपने सरीखे उस भोले से निरापद लक्ष्मण को अवश्य ही तलाशती हैं जो कि मेरे बचपन के साथ ही कहीं खो गया है ।


(इस मोलिक लेखन हेतु शुभ कामनाये ...केशव जांगिड ,उपसंपादक , मनोरंजन कलश )