हिंदी भाषा ,दशा और दिशा : कौन जिम्मेदार?
आज यदि हमें ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर देने को कहा जाए कि हम अपने बच्चों को कैसे स्कूल में पढ़ाना चाहते है ? तो हममे से अधिकाँश का यहीं उत्तर होगा कि - इंग्लिश मीडियम में क्यों? आखिर ऐसी क्या नौबत आ पड़ी ? जवाब ढूँढने पर यही मिलता है कि कहीं हिंदी मीडियम से पढ़कर हमारा बच्चा पिछड़ न जाए, अंगरेजी स्कूल में पढेगा तो होशियार न होते हुए भी कुछ तो कर ही लेगा, भले ही हिन्दी मीडियम का कितना ही बढ़िया स्कूल क्यों न हो आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ हद तक यह बात सही है भी किन्तु मेरे विचार से असल लड़ाई अंगरेजी और हिंदी में है ही नहीं कोई भी भाषा बुरी हो ही नहीं सकती आखिर वो तो संपर्क का जरिया है, समाज की वाणी है तो प्रश्न उठता है कि भाषा को लेकर कौन लड़ रहा है, लड़ा रहा है और क्यों ? असल में लड़ाई अन्ग्रेजीवाद और हिंदीवाद में है अन्ग्रेजीवाद से आशय हमारे देश में उस मानसिकता से है, उस तबके से है जो अपने को अलग बताने के लिए, अपने को ऊंचा बताने के लिए, अपने अहम् की पुष्टि के लिए अंगरेजी का सहारा लेते है चूंकि हमारे देश में अंगरेजी कभी आम जनता की भाषा नहीं रही मगर वो किसी समय शासक वर्ग की भाषा थी इसीलिए अंगरेजी को स्टेटस के रूप में प्रयोग किया गया किसी अन्य भाषा को नहीं और यही स्वभाव आज भी कायम है और पुष्ट ही हो रहा है जबकि स्वतंत्रता मिले भी हमें ६२ वर्ष से भी अधिक बीत चुके है जबकि दूसरी और हिंदी आम जनता की भाषा थी और है तो सवाल उठता है हिंदी भाषा की दशा क्या है और उसका ज़िम्मेदार कौन है ? क्या अंगरेजी या किसी अन्य भाषा ने उसे समाप्त कर दिया है ? जवाब है- नहीं, बिलकुल नहीं अंगरेजी ने हिन्दी को समाप्त नहीं किया है, लेकिन अंगरेजी ने हमारे देश में हिन्दी भाषियों में सेंध अवश्य लगाई है अंगरेजी के साथ लोग न चाहते हुए भी है और होंगे क्योंकि ब्रिटिश राज में ही अंगरेजी विश्व की भाषा बन गयी थी आज वैश्वीकरण के दौर में जब दूरियां कम हुई है, अंगरेजी ग्लोबल भाषा बन चुकी है और यहीं इसकी वृद्धि का मूल कारण है दूसरा हमने अंग्रेजो की दी हुई शिक्षा पध्धति को अपनाया, फलस्वरूप हमने हमारी भाषा में लिखी पुस्तकों के ज्ञान को उतना महत्व नहीं दिया आज भी हम बाहरी ज्ञान को उन्ही की भाषा में पढ़ रहे है आज भी यदि कोई हिंदी बोलता है और दूसरा यदि अंगरेजी बोलता है तो अंगरेजी बोलने वाले को ज्यादा महत्व मिलेगा, इसमें कोई शक की गुंजाइश है ही नहीं यह हमारी मानसिकता का परिचायक है हम आज भी दूषित और गुलाम मानसिकता और मनोवृति में जीते है और यहीं हिन्दी के कमज़ोर आत्मविश्वास के लिए ज़िम्मेदार है एक और बात जो दुखी करती है कि- हिन्दी आज हमारे ही देश में जो इसका जन्म स्थान है, राष्ट्र भाषा का दर्ज़ा नहीं पा सकी है, शायद नेताओं के कारण और हमारे कारण जिन्होंने कभी अन्य भाषाओं के सह अस्तित्व की बात समझने का प्रयत्न नहीं किया तमिल - हिंदी संघर्ष इसी का परिणाम था इसका सीधा लाभ अंगरेजी को मिला जो आज भी कई निजी और सरकारी कार्यालयों की भाषा है
प्रश्न उठता है की क्या वास्तव में हिन्दी इतनी कमज़ोर हो गयी है ? जवाब है - नहीं हमारे यहाँ हिंदी ने कभी बहिन भाषाओं की हत्या नहीं होने दी वरन अन्य भारतीय भाषाओं ने भी हिंदी को मज़बूत ही किया है आज भी हिंदी जानने, बोलने वाले लोग हमें विश्व के कई कोनो में मिल जाते है माना कि उनकी जड़े भारत से जुडी रही होगी किन्तु ऐसे भी कम नहीं जिनका इस देश से कोई लेना देना नहीं था, है किन्तु वे हिंदी में रूचि रखते है, हिंदी साहित्य और फिल्मो में रूचि रखते है जर्मनी, जापान , यु एस ए, ऑस्ट्रेलिया , यु के आदि कई देशो में हिन्दीभाषी लोगों कि संख्या तेजी से बढ़ी है ये वे लोग है जो हिन्दी, अंगरेजी और स्थानीय भाषा तीनो जानते है हमारे देश में भी हिंदी भाषी लोग कम नहीं हुए है, बल्कि बढे ही है, आम आदमी अब भी हिन्दी के साथ है, भले ही अंगरेजी जानने वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है किन्तु अंगरेजी के मुकाबले हिन्दीभाषियों की वृद्धि दर नगण्य है आज शहरीकरण के दौर के कारण नुक्सान स्थानीय भाषाओं, बोलियों को हुआ है उदाहरण के लिए मुझे याद है मैं आज से १० वर्ष पहले तक मेवाड़ी (राजस्थानी ) बोलता था किन्तु अब अधिकाँश हिन्दी और कहीं कहीं अंगरेजी भी बोलता हूँ जब गाँव जाता हूँ तो मेवाड़ी बोलता हूँ आज हिंदी देश की ग्लोबल भाषा बन गयी है, भारत में कुछ ही प्रदेश ऐसे है जहाँ हिंदी समझने वाले नहीं है आज इन्टरनेट पर हिन्दी साईट्स और ब्लोग्स मौजूद ही नहीं वरन लोकप्रिय भी है तेजी से हिन्दी का जाल बढता ही जा रहा है साथ ही अन्य भारतीय भाषाएं भी शून्य से बढकर तेजी से प्रगति कर रही है क्योंकि अब वो लोग भी यहाँ पर है जो जनता कहलाते है और हिन्दी जिनकी भाषा है, स्पष्ट है जिस तेजी से ये लोग इन्टरनेट आदि पर फैलेंगे हिंदी तब दिखाई देगी अंगरेजी से कम सही, मगर होगी, मिटेगी नहीं अंग्रेजी का बढता प्रभाव कम करना शायद संभव नहीं, किन्तु हमें अपनी हिन्दी को नहीं त्यागना होगा इसे मज़बूत तभी बनाया जा सकता है जब हम अपनी मानसिकता बदले और हिन्दी को सम्मान दे, हिन्दी भाषी को अंगरेजी के मुकाबले हे न समझे क्योंकि हम ही है जो यह स्थिति बदल सकते है, आखिर हमने ही इसे बनाया था ज़रुरत है हमें अपनी हिन्दी पर गर्व करने की, उसे दिल से अपनाने की, वर्ना अंगरेजी का दर्प तो रहेगा ही कुछ के दिलों दिमाग पर छाया हुआ जिसे मिटाया नहीं जा सकेगा क्योंकि उन्हें ज़रुरत है उसकी ताकि वो सदा ऊंचे ही बने रहे
गुरुवार, 7 जनवरी 2010
बुधवार, 6 जनवरी 2010
नव चेतना उत्सव -२०१० /लेखक -मनीष जैन
कहा कमी है हमारे विकास में (चीन को ध्यान में रखकर )शायद हम में से बहुत से लोगों को याद होगा कि चीन जो हमारा पडौसी देश है १९५० में स्वतंत्र हुआ था , हमसे भी २-३ वर्ष बाद में किन्तु यदि हम आज के परिप्रेक्ष्य में भारत और चीन कि तुलना करे तो यह बात सरलता से नहीं मनती आज चीन विकास के मामले में नित्य नए नए आयाम बना रहा है वही हम अब भी मंथर गति से आगे बढ़ रहे है कई बातो में तो वो अमेरिका, विकसित यूरोपीय देशो और रूस आदि से भी आगे बढ़ चुका है वस्तुतः बड़े देश की समस्याएँ भी बड़ी होती है, किन्तु चीन ने जनसँख्या तथा क्षेत्रफल दोनों ही दृष्टि से बड़े राष्ट्र होने के बाद भी समस्याओं को कभी हावी नहीं होने दिया, परिणाम सामने है विकास की यंत्सिक्यंग (गंगा) ऐसे क्या कारण है, तथ्य है जिनके कारण हमारा देश भारत आज भी विकास के मामले में उतना तेजी से नहीं बढ पाया जितना बढना था जैसे कि चीन ने किया आइये प्रकाश डाले कुछ बातों पर :१। स्वार्थपरक, दलगत, जातिगत और पक्षपात पूर्ण राजनीति - चुने हुए लोग भी स्वार्थ और पक्षपात की राजनीति में लिप्त पाए गए और उन्होंने देश के विकास की बजाय दल, जाती या क्षेत्र का विकास अधिक ज़रूरी समझा ऐसा शायद धार्मिक, जातीय तथा क्षेत्रीय विविधता के कारण भी संभव है, साथ ही कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना का भी इसमें योगदान है जबकि चीन में साम्यवाद राजनीति का मूल मंत्र रहा अतः विचारो पर झगड़ने के बनिस्पत उन्होंने जनता की समस्याओं को सुलझाने में मदद की , आखिर साम्यवाद का मूल उद्देश्य भी यहीं था की सभी वर्ग समान हो जाए, विकसित हो २. भ्रष्टाचार - अंग्रेज लोग जो नौकरशाही, राजनीति हमारे लिए छोड़ गए थे, उसे ही हमने हूबहू अपना लिया परिणामस्वरूप वो सभी कमिया भी हमने अपना ली जिन्हें अंग्रेजों ने जान बूझकर छोड़ा था वर्षो की नितांत गुलामी के बाद जब जनता भूखी थी, बीमार थी, गरीब थी, तब जिन्हें भी अवसर मिला और जिनका ईमान सस्ता था, उन्होंने सच झूठ किया, और अपने घर भर दिए उस सम्पति से जो जनता की थी, जनता के लिए थी और विकास बस कागजों में ही रहा अब तो भ्रष्टाचार यहाँ हर जगह फैल गया है और एक अंग बन चुका है व्यवस्था का जबकि चीन में स्थिति इतनी गंभीर नहीं है , फलस्वरूप पैसा अधिक मात्रा में लगा और विकास हुआइसके अलावा कुछ और बाते है जिनके कारण भी चीन विकास के मामले में भारत से आगे है १. चीन की उच्च बचत दर२. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने की समुचित नीतियां और वातावरण (हमारे यहाँ नीतियां अस्पष्ट तथा अवसरवादी है, वोट की राजनीति होती है ) ३. शांतिप्रिय और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण (नित होते दंगे, विस्फोट और अन्य घटनाओं से भय का माहोल है हमारे यहाँ, अतः निवेशक बिदकते है ) ४. शीघ्र निरणय लेने की क्षमता (जो की हमारे यहाँ दलों की खीचतान में संभव नहीं हो पाता, परमाणु करार इसका उदहारण है )५. समग्र सोच के साथ व्यापारिक दृष्टि ६. संसाधनों की प्रचुरता ( चीन के पास भारत से तीन गुना क्षेत्र है जबकि जनसँख्या कुछ ही अधिक है ) ७. दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा आत्म सम्मान और विकास से कोई समझोता नहीं (ब्रह्मपुत्र पर बाँध तथा ओलंपिक मशाल के लिए एवेरेस्ट तक सड़क बनाने की सोच चीन की दृढ इच्छा शक्ति दर्शाती है )८. निर्माण का शक्तिशाली केंद्र (भारत अभी भी दूसरो पर किसी न किसी रूप में निर्भर है )९. विदेशी व्यापार बढाना और सस्ती वस्तुओं के माध्यम से अन्य देशो के बाज़ार में सेंध लगाना, नए नए बाज़ार ढूंढना तथा मिली राशी को विकास पर खर्च करना (सतत और सकारात्मक बाजारी उपाय )१०. स्रजनात्मक, रोजगारोन्मुख तथा खोजी शिक्षा देकर कार्य उत्पादकता में वृद्धि उपरोक्त कुछ तथ्य तथा कुछ कारण है जिनके कारण आज भी हम पिछड़े है जबकि हमारा पडौसी देश चीन हमसे विकास में आगे है ज़रुरत है नेताओं को , जनता को सोचने की तथा कुछ कर दिखाने की एक एक कारण और बिंदु का हल संभव है बशर्ते प्रयत्न किया जाए .
कहा कमी है हमारे विकास में (चीन को ध्यान में रखकर )शायद हम में से बहुत से लोगों को याद होगा कि चीन जो हमारा पडौसी देश है १९५० में स्वतंत्र हुआ था , हमसे भी २-३ वर्ष बाद में किन्तु यदि हम आज के परिप्रेक्ष्य में भारत और चीन कि तुलना करे तो यह बात सरलता से नहीं मनती आज चीन विकास के मामले में नित्य नए नए आयाम बना रहा है वही हम अब भी मंथर गति से आगे बढ़ रहे है कई बातो में तो वो अमेरिका, विकसित यूरोपीय देशो और रूस आदि से भी आगे बढ़ चुका है वस्तुतः बड़े देश की समस्याएँ भी बड़ी होती है, किन्तु चीन ने जनसँख्या तथा क्षेत्रफल दोनों ही दृष्टि से बड़े राष्ट्र होने के बाद भी समस्याओं को कभी हावी नहीं होने दिया, परिणाम सामने है विकास की यंत्सिक्यंग (गंगा) ऐसे क्या कारण है, तथ्य है जिनके कारण हमारा देश भारत आज भी विकास के मामले में उतना तेजी से नहीं बढ पाया जितना बढना था जैसे कि चीन ने किया आइये प्रकाश डाले कुछ बातों पर :१। स्वार्थपरक, दलगत, जातिगत और पक्षपात पूर्ण राजनीति - चुने हुए लोग भी स्वार्थ और पक्षपात की राजनीति में लिप्त पाए गए और उन्होंने देश के विकास की बजाय दल, जाती या क्षेत्र का विकास अधिक ज़रूरी समझा ऐसा शायद धार्मिक, जातीय तथा क्षेत्रीय विविधता के कारण भी संभव है, साथ ही कहीं न कहीं असुरक्षा की भावना का भी इसमें योगदान है जबकि चीन में साम्यवाद राजनीति का मूल मंत्र रहा अतः विचारो पर झगड़ने के बनिस्पत उन्होंने जनता की समस्याओं को सुलझाने में मदद की , आखिर साम्यवाद का मूल उद्देश्य भी यहीं था की सभी वर्ग समान हो जाए, विकसित हो २. भ्रष्टाचार - अंग्रेज लोग जो नौकरशाही, राजनीति हमारे लिए छोड़ गए थे, उसे ही हमने हूबहू अपना लिया परिणामस्वरूप वो सभी कमिया भी हमने अपना ली जिन्हें अंग्रेजों ने जान बूझकर छोड़ा था वर्षो की नितांत गुलामी के बाद जब जनता भूखी थी, बीमार थी, गरीब थी, तब जिन्हें भी अवसर मिला और जिनका ईमान सस्ता था, उन्होंने सच झूठ किया, और अपने घर भर दिए उस सम्पति से जो जनता की थी, जनता के लिए थी और विकास बस कागजों में ही रहा अब तो भ्रष्टाचार यहाँ हर जगह फैल गया है और एक अंग बन चुका है व्यवस्था का जबकि चीन में स्थिति इतनी गंभीर नहीं है , फलस्वरूप पैसा अधिक मात्रा में लगा और विकास हुआइसके अलावा कुछ और बाते है जिनके कारण भी चीन विकास के मामले में भारत से आगे है १. चीन की उच्च बचत दर२. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने की समुचित नीतियां और वातावरण (हमारे यहाँ नीतियां अस्पष्ट तथा अवसरवादी है, वोट की राजनीति होती है ) ३. शांतिप्रिय और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण (नित होते दंगे, विस्फोट और अन्य घटनाओं से भय का माहोल है हमारे यहाँ, अतः निवेशक बिदकते है ) ४. शीघ्र निरणय लेने की क्षमता (जो की हमारे यहाँ दलों की खीचतान में संभव नहीं हो पाता, परमाणु करार इसका उदहारण है )५. समग्र सोच के साथ व्यापारिक दृष्टि ६. संसाधनों की प्रचुरता ( चीन के पास भारत से तीन गुना क्षेत्र है जबकि जनसँख्या कुछ ही अधिक है ) ७. दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति तथा आत्म सम्मान और विकास से कोई समझोता नहीं (ब्रह्मपुत्र पर बाँध तथा ओलंपिक मशाल के लिए एवेरेस्ट तक सड़क बनाने की सोच चीन की दृढ इच्छा शक्ति दर्शाती है )८. निर्माण का शक्तिशाली केंद्र (भारत अभी भी दूसरो पर किसी न किसी रूप में निर्भर है )९. विदेशी व्यापार बढाना और सस्ती वस्तुओं के माध्यम से अन्य देशो के बाज़ार में सेंध लगाना, नए नए बाज़ार ढूंढना तथा मिली राशी को विकास पर खर्च करना (सतत और सकारात्मक बाजारी उपाय )१०. स्रजनात्मक, रोजगारोन्मुख तथा खोजी शिक्षा देकर कार्य उत्पादकता में वृद्धि उपरोक्त कुछ तथ्य तथा कुछ कारण है जिनके कारण आज भी हम पिछड़े है जबकि हमारा पडौसी देश चीन हमसे विकास में आगे है ज़रुरत है नेताओं को , जनता को सोचने की तथा कुछ कर दिखाने की एक एक कारण और बिंदु का हल संभव है बशर्ते प्रयत्न किया जाए .
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
आमंत्रित आतिथी की कोड संख्या .....
नवचेतना विशेषांक में भाग लेने हेतु नमन ....
१०० -Akhilesh Kumar Pathak
९९- Satya P. Gautam
९८- Ranjana Kanti
९७- mar Dattani
९५- Nutan Thakur
९४- Vinayak Sharma
94 -भारत त्रिपाठी
९३ -Girindranath Jha
९२- Gopal Chakravarti
९१- Gargi A. Bagchi
९०- Manish Jain
८९- Ritesh Jangid
८८- Raju Jangid
88- प्रबल प्रताप सिंह
८७- Alok Tomar
८६- Vibha Rani
८५- Ambar Buxi
नवचेतना विशेषांक में भाग लेने हेतु नमन ....
१०० -Akhilesh Kumar Pathak
९९- Satya P. Gautam
९८- Ranjana Kanti
९७- mar Dattani
९५- Nutan Thakur
९४- Vinayak Sharma
94 -भारत त्रिपाठी
९३ -Girindranath Jha
९२- Gopal Chakravarti
९१- Gargi A. Bagchi
९०- Manish Jain
८९- Ritesh Jangid
८८- Raju Jangid
88- प्रबल प्रताप सिंह
८७- Alok Tomar
८६- Vibha Rani
८५- Ambar Buxi
शुभकामनाये
नूतन वर्ष की मंगल कामनाओ का साथ - साथ इस नव चेतना उत्सव -२०१० में भाग लेने हेतु मनोरंजन कलश और बाल साहित्य क्लब की और से बधाई ....पत्रिका का जनवरी अंक पाने हेतु पता केशव जांगिड @जीमेल .कॉम या मोबाईल से प्रेषित करे (०९२१०५००१६३० )..... निमंत्रण में जो विषय है ,से सम्बंबित आलेख ,कहानी या राय हिंदी में इसं पर पोस्ट करे ...केशव जांगिड @ जीमेल .कॉम ....या उत्सव में सात से बारहा तारीख तक १२.०० से उत्सव में दे ....
आप की कोड इस प्रकार है .....
०१ - केशव जांगिड (मुख्य निदेशक , बाल साहित्य क्लब )
०२ - कौशल किशोर (संपादक ,मनोरंजन कलश)
०३ - विजय राणा
०४ - सुषमा के के
०५ - डा जयप्रकाश (प्रमुख , अमृत कलश संस्थान)
०६ - राजकिशोर (ख्यात लेखक )
०७ - विपिन चौधरी (लेखिका )
०८ - शम्भू नाथ
१० - शिशिर पंडित
११ - नन्दलाल भारती
१२ - पंकज त्रिवेदी
१३ - सुनीता जांगिड
१४ - संजय द्विवेदी
१५ - वैभव शर्मा
१६ - एल्ल्पी माहवार
१७ - सुनील सिंघल
१८ - अनिल जांगिड ........... जारी
आप की कोड इस प्रकार है .....
०१ - केशव जांगिड (मुख्य निदेशक , बाल साहित्य क्लब )
०२ - कौशल किशोर (संपादक ,मनोरंजन कलश)
०३ - विजय राणा
०४ - सुषमा के के
०५ - डा जयप्रकाश (प्रमुख , अमृत कलश संस्थान)
०६ - राजकिशोर (ख्यात लेखक )
०७ - विपिन चौधरी (लेखिका )
०८ - शम्भू नाथ
१० - शिशिर पंडित
११ - नन्दलाल भारती
१२ - पंकज त्रिवेदी
१३ - सुनीता जांगिड
१४ - संजय द्विवेदी
१५ - वैभव शर्मा
१६ - एल्ल्पी माहवार
१७ - सुनील सिंघल
१८ - अनिल जांगिड ........... जारी
शनिवार, 26 दिसंबर 2009
समारोह संग एक प्रतियोगिता
मनोरंजन कलश (नव चेतना ) अंक के अवसर पर इस हिंदी बचाओ अभियान से जुड़े , मनोरंजन कलश की सदस्यता ले , हिंदी के लेखको से बातचीत कर एक हल तक पहुचने का प्रयास ......इस साहित्य उत्सव हेतु नाम देने के लिए केशव जांगिड @जीमेल.कॉम ,या मनोरंजन कलश @जीमेल. कॉम पर मेसेज करे । या कोशल किशोर (संपादक ) या केशव जांगिड (उप संपादक ) के फसबूक में जाकर मेसेज दे ,नाम और निम्न विषयों पर अपने विचार देने ओए हमारे सभी ब्लोग्स में स्थान पाने के लिए .... पाच दिन के इस उत्सव को पूरी तरह ओं लाइन मनाया जायगा । हिंदी को बचने में सयोग दे । चयनित विजेताओ को पुरुस्कारों से सम्मानित किया जायेगा । चयनित ५० लोगो की रचनाये और समीक्षा ही पोस्ट की जाएगी ।
सोजन्य ॥ बाल साहित्य क्लब ,कथा संसार ब्लॉग और मनोरंजन कलश
चर्चा के विषये ...१) भारत बिगडती राजनातिक दशा
२) बीजिंग ओलम्पिक जेसा हो पाएगा ,कॉमनवेल्थ खेल
३) कहा कमी है हमारे विकास में (चीन को धयान में रखकर )
४) हिंदी भाषा ,दशा और दिशा : कोन जिम्मेदार
५ ) भारतीय टीवी मीडिया : अयथार्थवादी और तथाकथित
६ ) भारतीय नारी : बन पाई अबला से सबला
इन विषयों में से किसी एक हेतु आपके मेसेज ५ जनवरी तक पोस्ट करे ....
७ से १२ जनवरी तक के इस उत्सव में होगा विचारमंथन ,मनोरंजन कलश में पाएगे आप स्थान ....
सविनय ...केशव जांगिड (उप संपादक ,मनोरंजन कलश )
सोजन्य ॥ बाल साहित्य क्लब ,कथा संसार ब्लॉग और मनोरंजन कलश
चर्चा के विषये ...१) भारत बिगडती राजनातिक दशा
२) बीजिंग ओलम्पिक जेसा हो पाएगा ,कॉमनवेल्थ खेल
३) कहा कमी है हमारे विकास में (चीन को धयान में रखकर )
४) हिंदी भाषा ,दशा और दिशा : कोन जिम्मेदार
५ ) भारतीय टीवी मीडिया : अयथार्थवादी और तथाकथित
६ ) भारतीय नारी : बन पाई अबला से सबला
इन विषयों में से किसी एक हेतु आपके मेसेज ५ जनवरी तक पोस्ट करे ....
७ से १२ जनवरी तक के इस उत्सव में होगा विचारमंथन ,मनोरंजन कलश में पाएगे आप स्थान ....
सविनय ...केशव जांगिड (उप संपादक ,मनोरंजन कलश )
सोमवार, 21 दिसंबर 2009

डाक्टर कविता किरण की रचना , केयर टू केयर की प्रमुख डाक्टर मोना कपूर का जीवन , डाक्टर जयप्रकाश गुप्त का हिंदी समीक्षा आलेख ,केशव जांगिड की कहानी विपिन चोधरी का नारी की पीढ़ा पर आलेख , मंजरी जोशी से एक मुलाकात ,भारतीय मीडिया पर विनोद विप्लव का व्यंग्य , और प्रभाष जोशी ,तसलीमा नसरीन की रचनाये .....
अंक जो आपको सोचने पर विवश कर दे ॥
प्रति मंगवाए या सदस्यता ले ॥ मूल्य मात्र ..१० /-
वार्षिक - १०० /- मात्र
फ़ोन - ०९२१०५००१६३ ( दिल्ली )
मेल - मनोरंजन कलश @ जीमेल .कॉम
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
कविता - मेरा बसंत
मकरंदित पुष्पों के झूलो में ,
भ्रमर से तितली के अनुबंधों में ,
प्रीत - स्नेह के नवबंधो में ,
आ रहा है मेरा बसंत।
दहकते पलाश की बोछार में ,
धरा से गगन के कटबंधो में ,
सोंधी अमलताश की सुगंधों में ,
गुनगुना रहा है मेरा बसंत ।
पीत - मुदित सरसों के पुष्पों में ,
गुलमोहर की मधुकर डालो में ,
गुलमोहर की मधुकर डालो में ,
उन्मुक्त , उन्मादक विलासों में ,
नवगीतों ,बधाई भरे उल्लासो में ,
महक रहा है मेरा बसंत ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)



