हिंदी भाषा ,दशा और दिशा : कौन जिम्मेदार?
आज यदि हमें ईमानदारी से इस प्रश्न का उत्तर देने को कहा जाए कि हम अपने बच्चों को कैसे स्कूल में पढ़ाना चाहते है ? तो हममे से अधिकाँश का यहीं उत्तर होगा कि - इंग्लिश मीडियम में क्यों? आखिर ऐसी क्या नौबत आ पड़ी ? जवाब ढूँढने पर यही मिलता है कि कहीं हिंदी मीडियम से पढ़कर हमारा बच्चा पिछड़ न जाए, अंगरेजी स्कूल में पढेगा तो होशियार न होते हुए भी कुछ तो कर ही लेगा, भले ही हिन्दी मीडियम का कितना ही बढ़िया स्कूल क्यों न हो आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ हद तक यह बात सही है भी किन्तु मेरे विचार से असल लड़ाई अंगरेजी और हिंदी में है ही नहीं कोई भी भाषा बुरी हो ही नहीं सकती आखिर वो तो संपर्क का जरिया है, समाज की वाणी है तो प्रश्न उठता है कि भाषा को लेकर कौन लड़ रहा है, लड़ा रहा है और क्यों ? असल में लड़ाई अन्ग्रेजीवाद और हिंदीवाद में है अन्ग्रेजीवाद से आशय हमारे देश में उस मानसिकता से है, उस तबके से है जो अपने को अलग बताने के लिए, अपने को ऊंचा बताने के लिए, अपने अहम् की पुष्टि के लिए अंगरेजी का सहारा लेते है चूंकि हमारे देश में अंगरेजी कभी आम जनता की भाषा नहीं रही मगर वो किसी समय शासक वर्ग की भाषा थी इसीलिए अंगरेजी को स्टेटस के रूप में प्रयोग किया गया किसी अन्य भाषा को नहीं और यही स्वभाव आज भी कायम है और पुष्ट ही हो रहा है जबकि स्वतंत्रता मिले भी हमें ६२ वर्ष से भी अधिक बीत चुके है जबकि दूसरी और हिंदी आम जनता की भाषा थी और है तो सवाल उठता है हिंदी भाषा की दशा क्या है और उसका ज़िम्मेदार कौन है ? क्या अंगरेजी या किसी अन्य भाषा ने उसे समाप्त कर दिया है ? जवाब है- नहीं, बिलकुल नहीं अंगरेजी ने हिन्दी को समाप्त नहीं किया है, लेकिन अंगरेजी ने हमारे देश में हिन्दी भाषियों में सेंध अवश्य लगाई है अंगरेजी के साथ लोग न चाहते हुए भी है और होंगे क्योंकि ब्रिटिश राज में ही अंगरेजी विश्व की भाषा बन गयी थी आज वैश्वीकरण के दौर में जब दूरियां कम हुई है, अंगरेजी ग्लोबल भाषा बन चुकी है और यहीं इसकी वृद्धि का मूल कारण है दूसरा हमने अंग्रेजो की दी हुई शिक्षा पध्धति को अपनाया, फलस्वरूप हमने हमारी भाषा में लिखी पुस्तकों के ज्ञान को उतना महत्व नहीं दिया आज भी हम बाहरी ज्ञान को उन्ही की भाषा में पढ़ रहे है आज भी यदि कोई हिंदी बोलता है और दूसरा यदि अंगरेजी बोलता है तो अंगरेजी बोलने वाले को ज्यादा महत्व मिलेगा, इसमें कोई शक की गुंजाइश है ही नहीं यह हमारी मानसिकता का परिचायक है हम आज भी दूषित और गुलाम मानसिकता और मनोवृति में जीते है और यहीं हिन्दी के कमज़ोर आत्मविश्वास के लिए ज़िम्मेदार है एक और बात जो दुखी करती है कि- हिन्दी आज हमारे ही देश में जो इसका जन्म स्थान है, राष्ट्र भाषा का दर्ज़ा नहीं पा सकी है, शायद नेताओं के कारण और हमारे कारण जिन्होंने कभी अन्य भाषाओं के सह अस्तित्व की बात समझने का प्रयत्न नहीं किया तमिल - हिंदी संघर्ष इसी का परिणाम था इसका सीधा लाभ अंगरेजी को मिला जो आज भी कई निजी और सरकारी कार्यालयों की भाषा है
प्रश्न उठता है की क्या वास्तव में हिन्दी इतनी कमज़ोर हो गयी है ? जवाब है - नहीं हमारे यहाँ हिंदी ने कभी बहिन भाषाओं की हत्या नहीं होने दी वरन अन्य भारतीय भाषाओं ने भी हिंदी को मज़बूत ही किया है आज भी हिंदी जानने, बोलने वाले लोग हमें विश्व के कई कोनो में मिल जाते है माना कि उनकी जड़े भारत से जुडी रही होगी किन्तु ऐसे भी कम नहीं जिनका इस देश से कोई लेना देना नहीं था, है किन्तु वे हिंदी में रूचि रखते है, हिंदी साहित्य और फिल्मो में रूचि रखते है जर्मनी, जापान , यु एस ए, ऑस्ट्रेलिया , यु के आदि कई देशो में हिन्दीभाषी लोगों कि संख्या तेजी से बढ़ी है ये वे लोग है जो हिन्दी, अंगरेजी और स्थानीय भाषा तीनो जानते है हमारे देश में भी हिंदी भाषी लोग कम नहीं हुए है, बल्कि बढे ही है, आम आदमी अब भी हिन्दी के साथ है, भले ही अंगरेजी जानने वाले लोगों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है किन्तु अंगरेजी के मुकाबले हिन्दीभाषियों की वृद्धि दर नगण्य है आज शहरीकरण के दौर के कारण नुक्सान स्थानीय भाषाओं, बोलियों को हुआ है उदाहरण के लिए मुझे याद है मैं आज से १० वर्ष पहले तक मेवाड़ी (राजस्थानी ) बोलता था किन्तु अब अधिकाँश हिन्दी और कहीं कहीं अंगरेजी भी बोलता हूँ जब गाँव जाता हूँ तो मेवाड़ी बोलता हूँ आज हिंदी देश की ग्लोबल भाषा बन गयी है, भारत में कुछ ही प्रदेश ऐसे है जहाँ हिंदी समझने वाले नहीं है आज इन्टरनेट पर हिन्दी साईट्स और ब्लोग्स मौजूद ही नहीं वरन लोकप्रिय भी है तेजी से हिन्दी का जाल बढता ही जा रहा है साथ ही अन्य भारतीय भाषाएं भी शून्य से बढकर तेजी से प्रगति कर रही है क्योंकि अब वो लोग भी यहाँ पर है जो जनता कहलाते है और हिन्दी जिनकी भाषा है, स्पष्ट है जिस तेजी से ये लोग इन्टरनेट आदि पर फैलेंगे हिंदी तब दिखाई देगी अंगरेजी से कम सही, मगर होगी, मिटेगी नहीं अंग्रेजी का बढता प्रभाव कम करना शायद संभव नहीं, किन्तु हमें अपनी हिन्दी को नहीं त्यागना होगा इसे मज़बूत तभी बनाया जा सकता है जब हम अपनी मानसिकता बदले और हिन्दी को सम्मान दे, हिन्दी भाषी को अंगरेजी के मुकाबले हे न समझे क्योंकि हम ही है जो यह स्थिति बदल सकते है, आखिर हमने ही इसे बनाया था ज़रुरत है हमें अपनी हिन्दी पर गर्व करने की, उसे दिल से अपनाने की, वर्ना अंगरेजी का दर्प तो रहेगा ही कुछ के दिलों दिमाग पर छाया हुआ जिसे मिटाया नहीं जा सकेगा क्योंकि उन्हें ज़रुरत है उसकी ताकि वो सदा ऊंचे ही बने रहे
गुरुवार, 7 जनवरी 2010
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